
बहुजन समाज पार्टी में इन दिनों संगठनात्मक फैसलों को लेकर लगातार हलचल देखने को मिल रही है। बीते कुछ महीनों में जहां पार्टी ने अनुशासनहीनता और पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोपों में कई नेताओं को बाहर का रास्ता दिखाया, वहीं अब उसी पार्टी में कुछ नेताओं की वापसी ने राजनीतिक चर्चाओं को तेज कर दिया है। जैसे जैसे उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की आहट करीब आ रही है, बसपा के भीतर रणनीतिक बदलाव साफ दिखाई दे रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में इसे पार्टी की नई संतुलन साधने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
वहाब चौधरी की घर वापसी से बदला समीकरण
ताजा घटनाक्रम में मुरादनगर के पूर्व विधायक वहाब चौधरी को बसपा में दोबारा शामिल कर लिया गया है। कुछ समय पहले उन्हें पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासित किया गया था, जो मायावती के निर्देश पर लिया गया कड़ा फैसला माना गया था। गाजियाबाद जिला अध्यक्ष मनोज कुमार जाटव ने 17 मार्च को उनके निष्कासन की आधिकारिक घोषणा की थी। लेकिन अब उसी फैसले को पलटते हुए पार्टी ने उन्हें फिर से संगठन में जगह दे दी है, जिससे स्थानीय राजनीति में नई हलचल पैदा हो गई है।

स्थानीय राजनीति में बढ़ी बेचैनी और नए समीकरण
वहाब चौधरी की वापसी के बाद मुरादनगर क्षेत्र में राजनीतिक समीकरण तेजी से बदलते दिखाई दे रहे हैं। उनके समर्थकों में जहां उत्साह का माहौल है, वहीं विरोधी खेमे में असमंजस और चिंता बढ़ गई है। माना जा रहा है कि उनकी वापसी से बसपा को स्थानीय स्तर पर मजबूती मिल सकती है, खासकर उन इलाकों में जहां पार्टी पहले कमजोर मानी जा रही थी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम आने वाले चुनावों को ध्यान में रखकर लिया गया रणनीतिक फैसला भी हो सकता है।
अन्य निष्कासन और संगठन में लगातार बदलाव
बसपा में हाल के महीनों में निष्कासन और वापसी का यह सिलसिला लगातार जारी है। 24 अप्रैल को पार्टी ने सहारनपुर मंडल के जोन प्रभारी हाजी सरफराज और केरलम के प्रभारी जयप्रकाश सिंह को भी पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते बाहर कर दिया था। लगातार हो रहे इन फैसलों से साफ है कि बसपा अपने संगठन को चुनाव से पहले पूरी तरह अनुशासित और मजबूत करना चाहती है। हालांकि, बार-बार बदलते फैसलों से पार्टी की अंदरूनी रणनीति को लेकर राजनीतिक चर्चाएं भी तेज हो गई हैं।
