
बिहार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश को लेकर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने राजनीतिक हलचल तेज कर दी है। विपक्ष इसे नैतिकता का सवाल बता रहा है, जबकि सत्तापक्ष अदालत की प्रक्रिया का इंतजार करने और पुराने राजनीतिक उदाहरणों की याद दिलाने में जुटा है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद बढ़ा विवाद
बिहार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश की नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद राज्य की राजनीति गरमा गई है। अदालत ने पूछा कि नियुक्ति के छह महीने पूरे होने के बाद भी यदि कोई मंत्री विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य नहीं बना है, तो वह पद पर कैसे बना रह सकता है। इस मामले की अगली सुनवाई 27 अगस्त को होगी।
RJD ने नैतिकता के आधार पर मांगा इस्तीफा
राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने मंत्री दीपक प्रकाश के इस्तीफे की मांग करते हुए कहा कि उन्हें नैतिकता के आधार पर स्वयं पद छोड़ देना चाहिए। पार्टी प्रवक्ता एजाज अहमद ने आरोप लगाया कि सरकार मंत्री की कुर्सी बचाने के लिए राजनीतिक जोड़-तोड़ कर रही है। उनका कहना है कि यदि दीपक प्रकाश बाद में विधान परिषद के सदस्य बनते हैं, तो उसके बाद दोबारा मंत्री पद की शपथ ले सकते हैं, लेकिन तब तक उन्हें पद पर बने रहने का अधिकार नहीं होना चाहिए।

MLC सीट खाली होने पर भी उठे सवाल
राजनीतिक विवाद उस समय और गहरा गया जब राज्यपाल द्वारा मनोनीत बीजेपी नेता और विधान परिषद सदस्य देवेश कुमार ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यह सीट दीपक प्रकाश को विधान परिषद भेजने के लिए खाली की गई है। हालांकि, सरकार या संबंधित दल की ओर से अभी तक इस संबंध में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।
बीजेपी ने RJD को इतिहास याद दिलाया
RJD के आरोपों पर पलटवार करते हुए बीजेपी प्रवक्ता कुंतल कृष्ण ने कहा कि अदालत की टिप्पणियों पर बिहार सरकार अपना पक्ष रखेगी और न्यायालय का जो भी फैसला होगा, उसका पालन किया जाएगा। उन्होंने RJD पर निशाना साधते हुए 1997 के चारा घोटाला प्रकरण का उल्लेख किया और कहा कि उस समय लालू प्रसाद यादव के जेल जाने के बाद राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाया गया था। बीजेपी का कहना है कि RJD को नैतिकता पर सवाल उठाने से पहले अपने राजनीतिक इतिहास पर भी नजर डालनी चाहिए।
संवैधानिक प्रावधान क्यों बने बहस का केंद्र?
भारतीय संविधान के अनुसार कोई भी व्यक्ति मंत्री बनने के बाद अधिकतम छह महीने तक बिना विधायक या विधान परिषद सदस्य बने पद पर रह सकता है। यदि इस अवधि में वह किसी सदन का सदस्य नहीं बनता, तो मंत्री पद पर बने रहने का अधिकार समाप्त हो जाता है। इसी संवैधानिक प्रावधान को लेकर यह पूरा विवाद खड़ा हुआ है।
दीपक प्रकाश का मामला अब केवल एक मंत्री की नियुक्ति तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह संवैधानिक प्रक्रिया, राजनीतिक नैतिकता और सत्ता-विपक्ष के टकराव का मुद्दा बन चुका है। अब सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई और बिहार सरकार के जवाब पर टिकी हैं, जिससे इस विवाद की दिशा तय होगी।
