
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के 2029 तक बीजेपी और उसके सहयोगी दलों की सरकार वाले राज्यों में समान नागरिक संहिता यानी UCC लागू करने के बयान के बाद राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है। इसी बीच बरेली के मौलाना शाहबुद्दीन रजवी ने वीडियो बयान जारी कर UCC पर अपना विरोध दर्ज कराया है।
‘UCC शरीयत में दखलंदाजी’
मौलाना शाहबुद्दीन रजवी ने कहा कि मुस्लिम समुदाय पहले ही UCC को लेकर अपना रुख स्पष्ट कर चुका है। उनके मुताबिक, ऐसा कानून जो मुस्लिम पर्सनल लॉ और शरीयत में दखल देता है, उसे मुसलमान स्वीकार नहीं करेंगे।
उन्होंने UCC को नागरिकों पर एकतरफा थोपे जाने वाला कानून बताते हुए कहा कि इस मुद्दे पर समुदाय की राय को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
सभी नागरिकों से राय लेने की मांग
मौलाना ने कहा कि अगर सरकार UCC लागू करना चाहती है तो सभी नागरिकों से राय-मशविरा किया जाना चाहिए। उनका तर्क है कि जब तक आम लोगों की राय व्यापक रूप से एकमत नहीं होती, तब तक कानून लाने पर सवाल उठेंगे।
उन्होंने दावा किया कि जिन राज्यों में UCC लागू किया गया, वहां मुसलमानों से पर्याप्त राय नहीं ली गई। हालांकि, UCC को लेकर संवैधानिक और कानूनी बहस अलग-अलग राज्यों में अलग परिस्थितियों में चली है।

मदरसों को लेकर भी सरकार पर निशाना
मौलाना शाहबुद्दीन रजवी ने मदरसों के मुद्दे पर भी सरकारों को घेरा। उन्होंने पश्चिम बंगाल में मदरसों को बंद करने से जुड़े बयान पर आपत्ति जताई और कहा कि मदरसे मुस्लिम समुदाय की जकात और अन्य सहयोग से चलते हैं।
उन्होंने संविधान में अल्पसंख्यकों को अपने शिक्षण संस्थान स्थापित करने के अधिकार का हवाला देते हुए मदरसों पर कार्रवाई को गलत बताया।
असम और उत्तराखंड का भी किया जिक्र
अपने बयान में मौलाना ने असम और उत्तराखंड का उदाहरण भी दिया। उन्होंने दावा किया कि असम में बड़ी संख्या में मदरसे बंद किए गए और उत्तराखंड में भी कई मदरसों पर कार्रवाई हुई।
उन्होंने इसे ‘फिरकापरस्त नजरिया’ बताते हुए मदरसों के ऐतिहासिक योगदान का उल्लेख किया। उनका कहना था कि स्वतंत्रता आंदोलन में कई उलेमा और मौलानाओं ने भी भाग लिया था।
आगे और बढ़ेगी सियासी बहस
UCC और मदरसों का मुद्दा आने वाले दिनों में राजनीतिक बहस के केंद्र में रह सकता है। एक तरफ सरकार समान नागरिक कानून को समानता और एकरूपता से जोड़ती है, वहीं विरोध करने वाले इसे व्यक्तिगत कानून और धार्मिक स्वतंत्रता से जोड़कर देखते हैं।
ऐसे में असली चुनौती केवल कानून बनाने की नहीं, बल्कि उस पर व्यापक सामाजिक सहमति बनाने की भी है। UCC पर आगे की राह संसद, अदालतों और जनता—तीनों स्तरों पर होने वाली बहस से तय होगी।
