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LNG और कच्चे तेल पर भारत की बढ़ती चुनौती, कितना मजबूत है देश का एनर्जी सुरक्षा कवच?

पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा की कमजोर कड़ियों को सामने ला दिया है। कतर से LNG आपूर्ति पर अनिश्चितता, सीमित रणनीतिक तेल भंडार और होर्मुज संकट के बीच भारत को महंगी वैकल्पिक खरीद पर निर्भर होना पड़ रहा है।

कतर की LNG सप्लाई पर क्यों टिकी नजर?

भारत की ऊर्जा जरूरतों में LNG की भूमिका लगातार बढ़ी है। लेकिन मार्च में कतर के रास लाफान क्षेत्र में LNG उत्पादन इकाइयों को नुकसान पहुंचने के बाद आपूर्ति बाधित हुई। कतर एनर्जी ने फोर्स मेज्योर लागू किया और अब सितंबर की सप्लाई को लेकर भी स्पष्टता नहीं है। पेट्रोनेट LNG के प्रमुख ए.के. सिंह ने 13 अगस्त को कहा कि सितंबर के लिए अभी कोई पक्का सप्लाई प्लान नहीं मिला है। अब तक 56 LNG कार्गो प्रभावित हो चुके हैं।

संकट का असर उद्योग और कीमतों पर

कतर से मिलने वाली अपेक्षाकृत सस्ती कॉन्ट्रैक्ट LNG की जगह भारत को वैकल्पिक और स्पॉट मार्केट से गैस खरीदनी पड़ रही है। इससे लागत बढ़ती है और इसका असर गैस आधारित उद्योग, बिजली, उर्वरक तथा सिटी गैस कंपनियों तक पहुंच सकता है।

हालांकि संकट के बावजूद भारत ने अमेरिका, ओमान, नाइजीरिया और अंगोला जैसे देशों से खरीद बढ़ाकर तत्काल कमी को काफी हद तक संभाला है। मई 2026 में अमेरिका भारत का सबसे बड़ा LNG सप्लायर बनकर उभरा था।

LNG और कच्चे तेल पर भारत की बढ़ती चुनौती, कितना मजबूत है देश का एनर्जी सुरक्षा कवच?

असली चिंता कच्चे तेल के भंडार की

LNG के साथ कच्चे तेल की तस्वीर भी पूरी तरह आरामदायक नहीं है। 23 मार्च 2026 को संसद में बताए गए आंकड़ों के मुताबिक भारत के रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार की क्षमता 5.33 मिलियन टन है, जबकि उसमें करीब 3.372 मिलियन टन तेल मौजूद था यानी लगभग 64 फीसदी क्षमता भरी हुई थी। पूरी क्षमता पर भी यह भंडार करीब 9.5 दिनों की जरूरत के बराबर है।

यानी रणनीतिक भंडार को अकेले देश की लंबी अवधि की सुरक्षा कवच मानना मुश्किल है।

90 दिन के मानक से अभी दूर भारत

भारत के पास रणनीतिक भंडार के अलावा तेल कंपनियों के व्यावसायिक स्टॉक भी हैं। सरकार के अनुसार इन सभी को मिलाकर कुल उपलब्ध कवरेज इससे कहीं ज्यादा है, लेकिन केवल SPR की क्षमता अंतरराष्ट्रीय 90-दिन वाले IEA मानक से काफी नीचे है।

सरकार ने चंडीखोल और पादुर के जरिए अतिरिक्त 6.5 मिलियन टन भंडारण क्षमता जोड़ने की योजना बनाई है। ऐसे प्रोजेक्ट ऊर्जा सुरक्षा के लिए अहम हैं, लेकिन इनके निर्माण में समय और निवेश दोनों लगते हैं।

LPG में भी बदली खरीद रणनीति

ऊर्जा संकट का असर LPG पर भी पड़ा है। भारत अपनी LPG जरूरत का करीब 60 फीसदी आयात करता है और मार्च में सरकार ने बताया था कि आयातित LPG का लगभग 90 फीसदी होर्मुज से होकर आता था। इसके बाद घरेलू उत्पादन बढ़ाने और अमेरिका समेत नए स्रोतों से खरीद बढ़ाने पर जोर दिया गया।

यह बदलाव दिखाता है कि भारत अब केवल एक क्षेत्र पर निर्भर रहने के बजाय सप्लाई स्रोतों में विविधता लाने की कोशिश कर रहा है।

आगे भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती

भारत ने अमेरिका, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और अन्य देशों से ऊर्जा खरीद बढ़ाकर तत्काल जोखिम को कम करने की कोशिश की है। लेकिन वैकल्पिक खरीद महंगी पड़ सकती है और लंबे समय तक भू-राजनीतिक संकट रहने पर आयात बिल बढ़ेगा।

सबसे बड़ा सबक यही है कि ऊर्जा सुरक्षा सिर्फ तेल और गैस खरीदने का सवाल नहीं, बल्कि पर्याप्त भंडारण, विविध सप्लायर और सुरक्षित समुद्री रास्तों का भी सवाल है। जब तक भारत अपने रणनीतिक भंडार और LNG सुरक्षा तंत्र को मजबूत नहीं करता, पश्चिम एशिया का हर बड़ा संकट देश की अर्थव्यवस्था और आम उपभोक्ता दोनों के लिए नई चुनौती बन सकता है।

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