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पिता को एक साल की उम्र में खोया, मां के संघर्ष से गीतिका ने मुंबई में बनाई अपनी पहचान

कुछ कहानियां सफलता से ज्यादा उस सफर के लिए याद रहती हैं, जिसने मंजिल तक पहुंचाया। सोनीपत की गीतिका विद्या ओहल्यान की कहानी भी ऐसी ही है। बचपन में पिता को खोने के बाद मां के संघर्ष और अपने जुनून के सहारे उन्होंने अभिनय की दुनिया में पहचान बनाई।

एक साल की उम्र में उठ गया पिता का साया

गीतिका जब महज एक साल की थीं, तभी बीमारी के कारण उनके पिता सुरेंद्र कुमार का निधन हो गया। बड़े भाई उस समय सिर्फ चार साल के थे। इसके बाद शिक्षिका मां विद्या ओहल्यान ने अकेले ही दोनों बच्चों की परवरिश की।

गीतिका मानती हैं कि उनकी मां का संघर्ष ही उनकी सबसे बड़ी प्रेरणा बना। वह अपनी मां के साथ नाना-नानी को भी अपना आदर्श मानती हैं।

पिता का अधूरा सपना बना बेटी की राह

गीतिका के पिता अभिनेता बनना चाहते थे और हरियाणवी फिल्म ‘बहू रानी’ में काम भी कर चुके थे। शायद यही वजह है कि अभिनय उनके लिए केवल करियर नहीं, बल्कि परिवार से जुड़ा एक सपना भी बन गया।

गीतिका अपने नाम के साथ मां का नाम जोड़ती हैं। उनके मुताबिक घर में मिले समानता और अपने सपनों को पूरा करने की आजादी ने उन्हें आत्मविश्वास दिया।

पिता को एक साल की उम्र में खोया, मां के संघर्ष से गीतिका ने मुंबई में बनाई अपनी पहचान

थिएटर ने अभिनय को दी धार

सोनीपत में पढ़ाई पूरी करने के बाद गीतिका ने दिल्ली के किरोड़ीमल कॉलेज से अंग्रेजी ऑनर्स किया और अंग्रेजी साहित्य में मास्टर डिग्री हासिल की। कॉलेज के दिनों में ही उनका जुड़ाव थिएटर से हुआ।

थिएटर ने उनके अभिनय को निखारने में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने ‘जंगुरा’ जैसे लाइव प्ले के करीब 300 एपिसोड किए। इसी दौरान उन्हें फिल्मों में काम करने का मौका मिला और उनके सफर ने नया मोड़ लिया।

‘सोनी’ से मिली बड़ी पहचान

2019 में रिलीज हुई फिल्म ‘सोनी’ से गीतिका ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की। फिल्म में पुलिस अधिकारी के किरदार में उनके अभिनय को काफी सराहना मिली और उन्हें क्रिटिक्स च्वाइस अवॉर्ड में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का सम्मान भी मिला।

इसके बाद ‘थप्पड़’, ‘अब तेरा क्या होगा लवली’, ‘दिल्ली डार्क’ और ‘12 बाई 12’ जैसी फिल्मों में उन्होंने अलग-अलग किरदार निभाए। वेब सीरीज ‘द ब्रोकन न्यूज’ में भी उनका काम देखने को मिला।

‘सतलुज’ में दमदार किरदार

हालिया फिल्म ‘सतलुज’ में गीतिका ने परमजीत कौर का किरदार निभाया। अभिनेता दिलजीत दोसांझ के साथ उनकी संवाद अदायगी और अभिनय ने दर्शकों का ध्यान खींचा।

गीतिका के अनुसार इस किरदार को समझने में उनकी मां और नानी के पहनावे, व्यवहार तथा पंजाब-हरियाणा की साझा संस्कृति से मिले संस्कारों ने मदद की। फिल्म को लेकर विवाद और रोक से वह भावनात्मक रूप से आहत भी हुईं।

पिता का सपना, मां का संघर्ष और बेटी की उड़ान

गीतिका अब अपनी आगामी फिल्मों ‘व्हाट रिमेंस’, ‘हवाई फायर’ और ‘मैं पल दो पल का शायर’ को लेकर उत्साहित हैं। सात फिल्मों और कई वेब सीरीज के बाद उनका सफर अभी जारी है।

उनकी कहानी सिर्फ एक अभिनेत्री की सफलता नहीं, बल्कि उस मां के संघर्ष की भी कहानी है जिसने मुश्किल हालात में बच्चों के सपनों को टूटने नहीं दिया। गीतिका ने साबित किया है कि परिस्थितियां रास्ता कठिन जरूर कर सकती हैं, लेकिन मजबूत इरादों के सामने मंजिल को हमेशा दूर नहीं रखा जा सकता।

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