राज्यराजनीति

मधेपुरा में शिक्षा व्यवस्था की बदहाली, दो कमरों और टीन शेड में पढ़ रहे 159 बच्चे

बिहार के मधेपुरा से सरकारी स्कूल की ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो शिक्षा व्यवस्था की जमीनी चुनौतियों को उजागर करती है। कक्षा एक से आठ तक के 159 बच्चों के लिए सिर्फ दो कमरे और एक टीन शेड है, जहां अलग-अलग कक्षाओं की पढ़ाई साथ-साथ चलती है।

दो कमरों में आठ कक्षाओं की पढ़ाई

मधेपुरा के इस विद्यालय में कक्षा एक से आठ तक कुल 159 बच्चे नामांकित हैं। लेकिन बच्चों की संख्या के मुकाबले स्कूल में पर्याप्त कमरे नहीं हैं। नतीजा यह है कि कई कक्षाओं के विद्यार्थियों को एक ही कमरे में बैठाकर पढ़ाना पड़ता है।

एक कमरे में कक्षा छह से आठ तक के बच्चे

शिक्षक राधेश्याम राम के मुताबिक, कक्षा छह, सात और आठ के विद्यार्थियों को एक ही कमरे में पढ़ाना पड़ता है। एक तरफ शिक्षक गणित समझाते हैं तो दूसरी ओर किसी दूसरी कक्षा में भाषा का पाठ चलता रहता है। ऐसे माहौल में बच्चों का ध्यान पढ़ाई पर बनाए रखना आसान नहीं है।

मधेपुरा में शिक्षा व्यवस्था की बदहाली, दो कमरों और टीन शेड में पढ़ रहे 159 बच्चे

शिक्षकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती सभी कक्षाओं का सिलेबस समय पर पूरा कराने की है।

टीन शेड में पढ़ाई, गर्मी में बढ़ती परेशानी

कमरों की कमी के कारण विद्यालय में टीन शेड का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। गर्मी के दिनों में टीन की छत काफी गर्म हो जाती है। ऐसे में बच्चों के लिए लंबे समय तक बैठकर पढ़ना मुश्किल हो जाता है।

इसके बावजूद स्कूल में पढ़ाई इसी सीमित व्यवस्था के बीच जारी है।

भवन के लिए राशि मिली, लेकिन जमीन नहीं मिली

प्रधानाध्यापक प्रमोद कुमार ने बताया कि स्कूल भवन निर्माण के लिए राशि स्वीकृत हुई थी। विभाग को कई बार विद्यालय की स्थिति से अवगत भी कराया गया। लेकिन भवन बनाने के लिए उपयुक्त जमीन उपलब्ध नहीं हो सकी।

जमीन नहीं मिलने के कारण निर्माण शुरू नहीं हुआ और स्वीकृत राशि वापस लौट गई।

रोज पहुंचते हैं 90 से 110 बच्चे

प्रधानाध्यापक के अनुसार, विद्यालय में 159 बच्चे नामांकित हैं, जबकि सामान्य तौर पर रोज करीब 90 से 110 विद्यार्थी स्कूल पहुंचते हैं। इतने बच्चों के लिए केवल दो कमरे उपलब्ध होना व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।

बच्चों की पढ़ाई पर सीधा असर

स्कूल में शिक्षकों की संख्या पांच है, जिनमें प्रधानाध्यापक भी शामिल हैं। शिक्षक अपनी ओर से सीमित संसाधनों में पढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अलग-अलग कक्षाओं को एक साथ पढ़ाने की मजबूरी का असर बच्चों की सीखने की प्रक्रिया पर पड़ना स्वाभाविक है।

शिक्षा सिर्फ स्कूल पहुंचने का नाम नहीं है। बच्चों को बेहतर भविष्य के लिए सुरक्षित और पर्याप्त सीखने का माहौल भी चाहिए। मधेपुरा के इस स्कूल की तस्वीर बताती है कि सरकारी योजनाओं और जमीनी जरूरतों के बीच की दूरी अब भी कई जगह बड़ी चुनौती बनी हुई है।

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