राज्यराजनीति

उत्तराखंड ने खोया ईमानदारी का सबसे बड़ा चेहरा, भुवन चंद्र खंडूड़ी नहीं रहे

उत्तराखंड की राजनीति में सादगी. अनुशासन और ईमानदारी की मिसाल माने जाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री Bhuvan Chandra Khanduri का 92 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उनके निधन की खबर सामने आते ही पूरे उत्तराखंड में शोक की लहर दौड़ गई। लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे खंडूड़ी देहरादून के मैक्स अस्पताल में भर्ती थे और वेंटिलेटर सपोर्ट पर थे। मंगलवार को उन्होंने अंतिम सांस ली। राज्य सरकार ने उनके सम्मान में तीन दिन का राजकीय शोक घोषित किया है। साथ ही बुधवार को प्रदेश के सभी सरकारी कार्यालयों और शिक्षण संस्थानों में अवकाश रखा गया। उनकी अंतिम यात्रा और अंत्येष्टि हरिद्वार में पूरे राजकीय और सैन्य सम्मान के साथ संपन्न हुई। राष्ट्रपति Droupadi Murmu. प्रधानमंत्री Narendra Modi. मुख्यमंत्री Pushkar Singh Dhami समेत कई बड़े नेताओं और गणमान्य लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। उपराष्ट्रपति C. P. Radhakrishnan भी विशेष विमान से देहरादून पहुंचे और उनके आवास जाकर श्रद्धांजलि अर्पित की।

सेना से राजनीति तक प्रेरणादायक रहा सफर

एक अक्टूबर 1934 को देहरादून में जन्मे भुवन चंद्र खंडूड़ी का जीवन अनुशासन और देशसेवा का प्रतीक माना जाता है। राजनीति में आने से पहले उन्होंने भारतीय सेना में 36 वर्षों तक सेवा दी। वर्ष 1954 में सेकेंड लेफ्टिनेंट के रूप में सेना में शामिल हुए खंडूड़ी 1991 में मेजर जनरल के पद से सेवानिवृत्त हुए। अपने सैन्य करियर के दौरान उन्होंने 1962 के भारत-चीन युद्ध और 1965 तथा 1971 के भारत-पाक युद्ध में अहम भूमिका निभाई। देशसेवा में उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें अति विशिष्ट सेवा मेडल से भी सम्मानित किया गया था। सेना से रिटायर होने के बाद उन्होंने राजनीति में कदम रखा और जल्द ही अपनी साफ छवि और सख्त कार्यशैली के कारण अलग पहचान बना ली। 1991 में वह पहली बार गढ़वाल लोकसभा सीट से सांसद चुने गए और इसके बाद पांच बार संसद पहुंचे। केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री रहते हुए उन्होंने देश में सड़क विकास की बड़ी योजनाओं को गति दी। स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना को आगे बढ़ाने में उनका योगदान हमेशा याद किया जाएगा।

उत्तराखंड ने खोया ईमानदारी का सबसे बड़ा चेहरा, भुवन चंद्र खंडूड़ी नहीं रहे

मुख्यमंत्री के रूप में ‘जीरो टॉलरेंस’ की पहचान

खंडूड़ी दो बार उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे और उनके कार्यकाल को सख्त प्रशासन तथा भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर कार्रवाई के लिए जाना जाता है। वर्ष 2007 से 2009 और फिर 2011 से 2012 तक उन्होंने मुख्यमंत्री पद संभाला। उस दौरान उनका ‘जीरो टॉलरेंस’ मॉडल काफी चर्चित रहा। वह अधिकारियों और मंत्रियों के कामकाज पर कड़ी नजर रखते थे और विकास कार्यों में पारदर्शिता पर विशेष जोर देते थे। उत्तराखंड में भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी मजबूत छवि इतनी प्रभावशाली थी कि लोग उन्हें ईमानदार राजनीति का चेहरा मानते थे। भाजपा और विपक्षी दलों के नेता भी उनकी कार्यशैली और व्यक्तिगत ईमानदारी की खुलकर तारीफ करते थे। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि खंडूड़ी का जीवन सार्वजनिक सेवा और अनुशासन का प्रेरणादायक उदाहरण रहेगा। उनके निधन को उत्तराखंड की राजनीति के लिए एक अपूरणीय क्षति बताया जा रहा है।

अंतिम विदाई में उमड़ा जनसैलाब

भुवन चंद्र खंडूड़ी के पार्थिव शरीर को सेना की एंबुलेंस से सैन्य अस्पताल गढ़ीकैंट ले जाया गया और वहां से पूरे सैन्य सम्मान के साथ उनके बसंत विहार स्थित आवास पहुंचाया गया। तिरंगे में लिपटे उनके पार्थिव शरीर के अंतिम दर्शन के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। उनकी बेटी और विधानसभा अध्यक्ष Ritu Khanduri Bhushan. बेटे मनीष खंडूड़ी. भाजपा और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता. सामाजिक संगठन और आम जनता ने भावुक होकर उन्हें श्रद्धांजलि दी। मुख्यमंत्री धामी छत्तीसगढ़ दौरे से लौटकर सीधे उनके आवास पहुंचे। बुधवार सुबह भाजपा प्रदेश कार्यालय में अंतिम दर्शन के बाद उनका पार्थिव शरीर हरिद्वार ले जाया गया जहां खड़खड़ी श्मशान घाट पर पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। उत्तराखंड के लोग आज भी उन्हें केवल पूर्व मुख्यमंत्री नहीं बल्कि अनुशासन. ईमानदारी और सादगी के प्रतीक के रूप में याद करते हैं। उनका जाना उत्तराखंड की राजनीति में एक ऐसे अध्याय का अंत माना जा रहा है जिसकी मिसाल लंबे समय तक दी जाती रहेगी।

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