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जयशंकर का यूरोप पर तीखा सवाल, भारत के खिलाफ इस्तेमाल हुए विदेशी हथियारों का दिलाया इतिहास

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने एक बार फिर भारत की विदेश नीति और राष्ट्रीय हितों को लेकर स्पष्ट संदेश दिया है। फिनलैंड में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान रूस से तेल खरीदने को लेकर पूछे गए सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने पश्चिमी देशों के दोहरे मानदंडों पर निशाना साधा। जयशंकर ने कहा कि कई यूरोपीय देशों ने वर्षों तक ऐसे हथियार बेचे हैं, जिनका इस्तेमाल भारत के खिलाफ किया गया।

उन्होंने कहा कि भारत ने कभी यूरोप की सुरक्षा को खतरे में डालने वाला कोई कदम नहीं उठाया, लेकिन इसके बावजूद यूरोपीय देशों में निर्मित हथियार पाकिस्तान के माध्यम से भारत के खिलाफ उपयोग किए जाते रहे हैं। उनके इस बयान ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म दिया है।

भारत-पाकिस्तान के बीच हुए कई सैन्य संघर्षों के इतिहास पर नजर डालें तो पाकिस्तान ने विभिन्न देशों से खरीदे गए हथियारों का इस्तेमाल भारतीय सेना के खिलाफ किया है। 1965 और 1971 के युद्धों के दौरान पाकिस्तान की सेना और वायुसेना के पास पश्चिमी देशों से प्राप्त कई सैन्य उपकरण मौजूद थे। बाद के वर्षों में भी पाकिस्तान ने यूरोपीय और अन्य विदेशी रक्षा प्रणालियों का उपयोग अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने के लिए किया।

फ्रांस में निर्मित मिराज लड़ाकू विमान पाकिस्तान वायुसेना का लंबे समय तक महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। इन विमानों का इस्तेमाल भारत के साथ तनावपूर्ण परिस्थितियों और सैन्य अभियानों में किया गया। इसी प्रकार फ्रांसीसी तकनीक से विकसित पनडुब्बियों ने भी पाकिस्तान की नौसैनिक ताकत को मजबूत किया।

इतिहास में 1971 के युद्ध के दौरान पाकिस्तान की पनडुब्बी द्वारा भारतीय नौसेना के युद्धपोत INS खुकरी को निशाना बनाए जाने की घटना भी दर्ज है। इसके अलावा कई पश्चिमी देशों में निर्मित हथियार, गोला-बारूद और सैन्य उपकरण विभिन्न समयों पर पाकिस्तान की सेना के पास रहे हैं।

जयशंकर का बयान ऐसे समय आया है जब वैश्विक राजनीति में ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा सहयोग और रणनीतिक साझेदारियों को लेकर नई बहस चल रही है। भारत लगातार यह कहता रहा है कि उसके ऊर्जा और सुरक्षा संबंधी फैसले राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर लिए जाते हैं, न कि किसी बाहरी दबाव के आधार पर।

विदेश मंत्री ने अपने जवाब के माध्यम से यह भी संकेत दिया कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में देशों को अपने हितों की रक्षा का अधिकार है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि भारत अपने नागरिकों की ऊर्जा जरूरतों और राष्ट्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता देता रहेगा।

जयशंकर की टिप्पणी को भारत की स्वतंत्र और संतुलित विदेश नीति के दृष्टिकोण के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें राष्ट्रीय हित सर्वोपरि माने जाते हैं।

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