ओडिशा में क्रॉस वोटिंग विवाद पर बड़ा फैसला, 11 विधायकों की सदस्यता बची

ओडिशा विधानसभा अध्यक्ष सुरमा पाढ़ी ने राज्यसभा चुनाव के दौरान कथित क्रॉस वोटिंग करने वाले 11 विधायकों के खिलाफ दायर अयोग्यता याचिकाओं को खारिज कर दिया है। बीजू जनता दल (BJD) और कांग्रेस ने इन विधायकों पर पार्टी लाइन के खिलाफ मतदान करने का आरोप लगाते हुए उनकी सदस्यता समाप्त करने की मांग की थी। हालांकि विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि प्रस्तुत याचिकाएं कानूनी मानकों पर खरी नहीं उतरतीं और उनमें पर्याप्त साक्ष्य भी नहीं हैं।
BJD और कांग्रेस ने लगाए थे दल-बदल के आरोप
बीजद की मुख्य सचेतक प्रमिला मलिक ने अपनी पार्टी के आठ विधायकों के खिलाफ अयोग्यता याचिका दायर की थी। वहीं कांग्रेस विधायक दल के नेता रामचंद्र कदम ने अपनी पार्टी के तीन विधायकों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी। विपक्ष का आरोप था कि इन विधायकों ने पार्टी व्हिप और आधिकारिक निर्देशों का उल्लंघन करते हुए राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग की, जो संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत दल-बदल विरोधी कानून का उल्लंघन है।
स्पीकर बोले- पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिले
विधानसभा सचिवालय द्वारा जारी अधिसूचना में कहा गया कि याचिकाएं अस्पष्ट, अधूरी और कानूनी आवश्यकताओं को पूरा नहीं करती थीं। जांच के दौरान यह भी पाया गया कि विधायकों के खिलाफ ऐसे ठोस प्रमाण नहीं हैं, जिनसे यह साबित हो सके कि उन्होंने स्वेच्छा से पार्टी छोड़ी या दल-बदल किया। स्पीकर सुरमा पाढ़ी ने कहा कि उनका निर्णय पूरी तरह कानून के अनुसार लिया गया है और याचिकाओं में पर्याप्त तथ्य और प्रमाण उपलब्ध नहीं थे।

राज्यसभा चुनाव में विपक्ष को लगा था झटका
यह पूरा विवाद 16 मार्च को हुए राज्यसभा चुनाव से जुड़ा है। उस चुनाव में बीजद ने कांग्रेस और माकपा के समर्थन से प्रसिद्ध यूरोलॉजिस्ट डॉ. दत्तेश्वर होता को संयुक्त उम्मीदवार बनाया था। विपक्षी गठबंधन के पास विधानसभा में पर्याप्त संख्या बल होने के बावजूद डॉ. होता चुनाव हार गए। भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार और पूर्व केंद्रीय मंत्री दिलीप रे ने जीत दर्ज की। विपक्ष का आरोप था कि उनके 11 विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की, जिसके कारण यह हार हुई।
बढ़ सकती है राजनीतिक बयानबाजी
स्पीकर के इस फैसले के बाद ओडिशा की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो सकता है। बीजद और कांग्रेस पहले ही इन विधायकों की भूमिका पर सवाल उठा चुके हैं। अब अयोग्यता याचिकाएं खारिज होने के बाद विपक्षी दलों के लिए यह बड़ा झटका माना जा रहा है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी और तेज होने की संभावना है।
