PM मोदी के फास्ट ट्रैक कोर्ट ऐलान पर रोहिणी आचार्य का हमला, शिक्षा मंत्री से जवाबदेही पर उठाए सवाल

पेपर लीक मामलों में फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ऐलान के बाद राष्ट्रीय जनता दल (RJD) प्रमुख लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए सरकार की भूमिका, शिक्षा मंत्री की जवाबदेही और छात्रों के भविष्य को लेकर कई सवाल उठाए।
रोहिणी आचार्य ने PM मोदी पर साधा निशाना
गुरुवार को अपने एक्स (पूर्व ट्विटर) पोस्ट में रोहिणी आचार्य ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब युवाओं और छात्रों के बढ़ते विरोध के बाद सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्षों तक पेपर लीक की घटनाएं होती रहीं, लेकिन सरकार ने समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए।
शिक्षा मंत्री की जवाबदेही पर उठाया सवाल
रोहिणी आचार्य ने पूछा कि पेपर लीक के लगातार सामने आते मामलों के बावजूद अब तक शिक्षा मंत्री की जिम्मेदारी और जवाबदेही क्यों तय नहीं की गई। उन्होंने सवाल किया कि सरकार ने इस मुद्दे पर अब तक ठोस कार्रवाई क्यों नहीं की।

छात्रों और परिवारों को लेकर भी पूछे सवाल
अपने पोस्ट में उन्होंने कहा कि पेपर लीक की घटनाओं से प्रभावित छात्रों और कथित तौर पर जान गंवाने वाले छात्रों के परिवारों के प्रति सरकार ने क्या संवेदनशील कदम उठाए। उन्होंने यह भी पूछा कि सरकार की ओर से ऐसे परिवारों के लिए क्या योजना बनाई गई है।
स्थायी समाधान की मांग
रोहिणी आचार्य ने सरकार से पेपर लीक जैसी घटनाओं को रोकने के लिए स्थायी समाधान, स्पष्ट ब्लूप्रिंट और रोडमैप सार्वजनिक करने की मांग की। उनका कहना था कि केवल घोषणाओं से समस्या का समाधान नहीं होगा और परीक्षा प्रणाली को सुरक्षित बनाने के लिए ठोस व्यवस्था जरूरी है।
फास्ट ट्रैक कोर्ट पर जारी राजनीतिक बहस
प्रधानमंत्री के फास्ट ट्रैक कोर्ट संबंधी ऐलान के बाद पेपर लीक का मुद्दा राजनीतिक बहस का केंद्र बना हुआ है। सत्ता पक्ष इसे दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की दिशा में कदम बता रहा है, जबकि विपक्ष सरकार की पूर्व भूमिका और जवाबदेही पर सवाल उठा रहा है।
पेपर लीक को लेकर देश में राजनीतिक बयानबाजी लगातार तेज हो रही है। प्रधानमंत्री के फास्ट ट्रैक कोर्ट वाले ऐलान के बाद विपक्ष सरकार से जवाबदेही और दीर्घकालिक समाधान की मांग कर रहा है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा राजनीतिक और संसदीय बहस का प्रमुख विषय बना रह सकता है।
