पूर्व दिल्ली मुख्य सचिव राकेश मेहता की दर्दनाक मौत और प्रशासनिक विरासत

राजधानी की सड़कों, बसों और बिजली व्यवस्था को बदलने में अहम भूमिका निभाने वाले पूर्व मुख्य सचिव राकेश मेहता की मौत ने एक ऐसे प्रशासक की कहानी सामने ला दी है, जिसने दशकों तक व्यवस्था को गति दी, लेकिन जीवन के अंतिम वर्षों में कथित तौर पर बीमारी, तनाव और अकेलेपन से जूझते रहे।
दिल्ली को बदलने वाले अफसर का अंत
75 वर्षीय राकेश मेहता की नोएडा के सेक्टर-82 स्थित केंद्रीय विहार-2 सोसाइटी के किराए के फ्लैट में आत्महत्या से मौत हो गई। मौके से मिले अंग्रेजी में लिखे एक पन्ने में उन्होंने लंबे समय से हाइपरटेंशन, बीपी, शुगर, हाथ-पैरों में कंपन और मानसिक तनाव से परेशान होने की बात कही। नोट में उन्होंने अपनी मौत के लिए किसी को जिम्मेदार नहीं ठहराया।
सेंट स्टीफंस से IAS तक का सफर
देहरादून से ताल्लुक रखने वाले मेहता का शैक्षणिक सफर भी उल्लेखनीय रहा। उन्होंने सेंट स्टीफंस कॉलेज से BA, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से MA और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से MSc किया। वर्ष 1975 में उनका चयन IAS में हुआ और उन्हें AGMUT कैडर मिला।

शीला दीक्षित के भरोसेमंद साथी
2007 से नवंबर 2010 तक दिल्ली के मुख्य सचिव रहे मेहता को तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का भरोसेमंद अधिकारी माना जाता था। दिल्ली में बिजली सुधार, MCD के यूनिट एरिया सिस्टम और पर्यावरण से जुड़े एयर एंबियंस फंड जैसे कदमों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
नीली बसों से लो-फ्लोर बसों तक
दिल्ली की सड़कों पर चलने वाली नीली बसें कभी दुर्घटनाओं के कारण आलोचना का केंद्र थीं। उनके स्थान पर आधुनिक लो-फ्लोर DTC बसों की व्यवस्था तैयार करने में मेहता की भूमिका बताई जाती है। उनका प्रशासनिक अंदाज फाइलों को रोकने के बजाय तेजी से फैसले लेने पर केंद्रित था।
CWG के दौरान दिखा प्रबंधन कौशल
2010 के राष्ट्रमंडल खेलों से पहले दिल्ली में फ्लाइओवर, मेट्रो विस्तार और स्टेडियमों से जुड़े कई काम समय पर पूरे कराने की बड़ी चुनौती थी। पूर्व सहयोगियों के मुताबिक, मेहता काम में देरी के सख्त खिलाफ थे और बैठकों के फैसलों को तेजी से लागू कराने पर जोर देते थे।
आखिरी दिनों का अकेलापन
2010 में रिटायरमेंट के बाद कुछ समय उन्होंने परिवार के साथ बिताया। बताया गया कि पिछले करीब पांच वर्षों से वह नोएडा में अकेले रह रहे थे। पत्नी सुमति मेहता और बेटा देहरादून में रहते थे, जबकि बेटी लंदन में थी।
6 सितंबर को पत्नी के कई फोन का जवाब नहीं मिलने पर सुरक्षा कर्मी को फ्लैट भेजा गया। अंदर उनका शव मिला। सोमवार को अंतिम संस्कार हुआ। उनकी मौत अब सिर्फ एक पूर्व नौकरशाह की व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि यह सवाल भी छोड़ गई है कि व्यवस्था बनाने वाले लोगों के अपने जीवन में तनाव और अकेलेपन की कितनी जगह बन जाती है।
