“पापा कब आएंगे?” मासूम बच्चों के सवाल ने झकझोरा, होर्मुज हमले में देवरिया के शिवानंद की मौत

ओमान के समुद्री क्षेत्र में होर्मुज स्ट्रेट के पास हुए हमले ने उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के एक परिवार की खुशियां हमेशा के लिए छीन लीं। इस हमले में जान गंवाने वाले भारतीय नाविकों में देवरिया के सुरौली गांव निवासी 31 वर्षीय शिवानंद चौरसिया भी शामिल थे। घटना की खबर मिलते ही पूरे गांव में मातम पसर गया, जबकि उनके घर का माहौल किसी दर्दनाक त्रासदी से कम नहीं है।
घर के आंगन में रिश्तेदारों और परिजनों की चीख-पुकार गूंज रही है, लेकिन पांच साल का बेटा राजवीर और दो साल की बेटी वानिका अभी भी इस सच्चाई से अनजान हैं कि उनके पिता अब कभी वापस नहीं लौटेंगे। दोनों मासूम बच्चों की निगाहें बार-बार दरवाजे की ओर उठ जाती हैं, मानो उन्हें अब भी अपने पिता के लौटने का इंतजार हो।
परिजनों के अनुसार, शिवानंद चौरसिया परिवार की आर्थिक रीढ़ थे। वह घर के सबसे जिम्मेदार सदस्य माने जाते थे और पूरे परिवार का खर्च उठाते थे। उनकी मां कलावती देवी ने बताया कि एक सप्ताह पहले ही बेटे से आखिरी बार बातचीत हुई थी। उन्हें क्या पता था कि वह बातचीत आखिरी साबित होगी।
पत्नी सुशीला का रो-रोकर बुरा हाल है। उन्होंने बताया कि शिवानंद करीब छह महीने पहले ही नौकरी के लिए मुंबई गए थे। परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत करने और बच्चों का भविष्य बेहतर बनाने के लिए उन्होंने टैंकर शिप में फिटर की नौकरी शुरू की थी। यह उनकी पहली समुद्री तैनाती थी और वह मुंबई से सिंगापुर होते हुए अंतरराष्ट्रीय रूट पर काम कर रहे थे।
शिवानंद की बहन सोनी ने बताया कि परिवार पहले से आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा था। ऐसे में शिवानंद ही सभी की उम्मीदों का सहारा थे। पिता रामजी चौरसिया भी गहरे सदमे में हैं। उनका कहना है कि अभी तक बेटे का पार्थिव शरीर घर नहीं पहुंचा है और पूरा परिवार अंतिम दर्शन का इंतजार कर रहा है।
जानकारी के मुताबिक, जिस टैंकर पर शिवानंद कार्यरत थे, उस पर कुल 24 भारतीय क्रू सदस्य मौजूद थे। हमले के बाद 21 लोगों को सुरक्षित बचा लिया गया, लेकिन शिवानंद समेत तीन भारतीयों की मौत हो गई। इस दुखद सूचना की जानकारी सबसे पहले दुबई में रहने वाले उनके छोटे भाई राम प्रवेश चौरसिया को मिली, जिन्होंने परिवार को इसकी खबर दी।
सुरौली गांव में आज हर आंख नम है। गांव के लोग परिवार को ढांढस बंधाने पहुंच रहे हैं, लेकिन मासूम बच्चों की मासूमियत और पिता के इंतजार में टिकी उनकी आंखें हर किसी को भावुक कर रही हैं। एक परिवार का सहारा छिन गया है और दो बच्चों के सिर से पिता का साया हमेशा के लिए उठ गया है।
