
बिहार की राजनीति में इन दिनों कैबिनेट विस्तार को लेकर जबरदस्त हलचल देखने को मिल रही है। मुख्यमंत्री Samrat Choudhary के नेतृत्व में बनने वाली नई सरकार का पहला बड़ा मंत्रिमंडल विस्तार 7 मई को प्रस्तावित है। इससे पहले सहयोगी दलों के बीच हिस्सेदारी को लेकर खींचतान तेज हो गई है। जेडीयू के प्रदेश अध्यक्ष Umesh Kushwaha ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि उनकी पार्टी इस विस्तार में 16 मंत्री पद चाहती है। उनके इस बयान ने एनडीए गठबंधन के भीतर समीकरणों को और रोचक बना दिया है।
नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद बदला सत्ता संतुलन
हाल ही में Nitish Kumar के राज्यसभा के लिए निर्वाचित होने के बाद मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद बिहार की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला। इसके बाद बीजेपी के नेता सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाया गया, जो राज्य के पहले भाजपा मुख्यमंत्री बने हैं। इस बदलाव के बाद गठबंधन के भीतर ताकत का संतुलन भी बदल गया है। फिलहाल मंत्रिमंडल में जेडीयू के केवल दो वरिष्ठ नेता शामिल हैं, जिन्हें उपमुख्यमंत्री बनाया गया है, लेकिन अब पार्टी अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए दबाव बना रही है।

संवैधानिक सीमा और गठबंधन की चुनौती
बिहार विधानसभा में कुल 243 सदस्य हैं, जिसके आधार पर संविधान के अनुसार राज्य मंत्रिपरिषद में अधिकतम 30 मंत्री ही शामिल किए जा सकते हैं। ऐसे में जेडीयू की 16 मंत्री पदों की मांग को पूरा करना गठबंधन के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। एनडीए में बीजेपी के अलावा लोक जनशक्ति पार्टी, हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा और राष्ट्रीय लोक मोर्चा जैसे अन्य सहयोगी दल भी शामिल हैं, जो अपने हिस्से की उम्मीद लगाए बैठे हैं। इस स्थिति में सभी दलों के बीच संतुलन बनाना नेतृत्व के लिए एक बड़ी परीक्षा होगी।
निशांत कुमार को लेकर चर्चा और भविष्य की रणनीति
कैबिनेट विस्तार से पहले Nishant Kumar को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं। जब इस मुद्दे पर जेडीयू नेता उमेश कुशवाहा से सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि पार्टी चाहती थी कि निशांत मंत्री बनें, लेकिन उन्होंने फिलहाल संगठन को मजबूत करने पर ध्यान देने का फैसला किया है। हाल ही में उनकी ‘सद्भाव यात्रा’ ने यह संकेत दिया है कि वह धीरे-धीरे राजनीति में अपनी सक्रियता बढ़ा रहे हैं। ऐसे में आने वाले समय में उनकी भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो सकती है, जिससे बिहार की राजनीति में नए समीकरण बन सकते हैं।
