
हरियाणा की राजनीति में उस समय हलचल मच गई जब सोनीपत नगर निगम मेयर चुनाव के लिए कांग्रेस के घोषित उम्मीदवार कमल दीवान ने अचानक चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया। यह फैसला नामांकन के महज 24 घंटे के भीतर सामने आया जिसने पार्टी को असहज स्थिति में ला दिया है। सूत्रों के मुताबिक इस फैसले के पीछे कांग्रेस की अंदरूनी गुटबाजी और संगठनात्मक मतभेद प्रमुख कारण माने जा रहे हैं। खास बात यह है कि नामांकन के दौरान पार्टी के कई बड़े नेता मौजूद थे और पूरी ताकत के साथ उम्मीदवार को मैदान में उतारा गया था। ऐसे में अचानक लिया गया यह निर्णय कांग्रेस के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है।
नामांकन में दिखी ताकत, लेकिन 24 घंटे में बदला पूरा समीकरण
बुधवार को नामांकन के दौरान कमल दीवान के समर्थन में भारी भीड़ उमड़ी थी और इसे कांग्रेस के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा था। उन्होंने खुद सोशल मीडिया पर तस्वीरें साझा कर जनता के समर्थन को बदलाव की उम्मीद बताया था। नामांकन से पहले हवन यज्ञ का आयोजन भी किया गया जिसमें दीपेंद्र सिंह हुड्डा और राव नरेंद्र सिंह जैसे वरिष्ठ नेता मौजूद रहे। लेकिन इसके अगले ही दिन उनका चुनाव लड़ने से पीछे हटना राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है। इससे यह साफ संकेत मिल रहा है कि पार्टी के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है और रणनीति स्तर पर भी चुनौतियां बनी हुई हैं।

बीजेपी ने फिर जताया भरोसा, मुकाबला हुआ दिलचस्प
दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी ने एक बार फिर राजीव जैन पर भरोसा जताया है जो पहले भी उपचुनाव में जीत हासिल कर चुके हैं। पिछले मुकाबले में राजीव जैन ने कमल दीवान को बड़े अंतर से हराया था। इस बार भी वही चेहरा मैदान में होने से चुनाव और अधिक दिलचस्प हो गया है। हालांकि कांग्रेस के उम्मीदवार के पीछे हटने से बीजेपी को मनोवैज्ञानिक बढ़त मिल सकती है। अब यह देखना अहम होगा कि कांग्रेस नए उम्मीदवार के साथ किस तरह चुनावी रणनीति तैयार करती है और क्या वह मुकाबले को फिर से बराबरी पर ला पाती है।
कांग्रेस की रणनीति पर सवाल, चुनाव से पहले बढ़ी चुनौती
कमल दीवान का कांग्रेस से पुराना जुड़ाव रहा है और उनका परिवार भी लंबे समय से पार्टी से जुड़ा रहा है। पंजाबी समुदाय में उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है जो चुनावी दृष्टि से महत्वपूर्ण है। ऐसे में उनका अचानक पीछे हटना पार्टी के लिए रणनीतिक नुकसान माना जा रहा है। सोनीपत नगर निगम चुनाव 10 मई 2026 के आसपास होने वाले हैं और कांग्रेस ने पहले ही इस चुनाव को लेकर पूरी ताकत झोंक दी थी। लेकिन अब उम्मीदवार बदलने की मजबूरी ने पार्टी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। यह घटनाक्रम इस बात का संकेत है कि आने वाले दिनों में हरियाणा की राजनीति और भी ज्यादा दिलचस्प और चुनौतीपूर्ण हो सकती है।
