राज्यराजनीति

छेड़छाड़ केस के आरोपी को सपा में बड़ी जिम्मेदारी, कानपुर में नियुक्ति पर उठे सवाल

उत्तर प्रदेश के कानपुर में समाजवादी पार्टी ने अपनी सहयोगी इकाई लोहिया वाहिनी के ग्रामीण जिला अध्यक्ष पद पर अमर सिंह यादव की नियुक्ति की है। इस फैसले के बाद राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है, क्योंकि अमर सिंह यादव के खिलाफ वर्ष 2023 में महिला से छेड़छाड़ और जान से मारने की धमकी देने का मामला दर्ज हो चुका है। हालांकि, उन्होंने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए खुद को राजनीतिक साजिश का शिकार बताया है।

2023 में दर्ज हुई थी एफआईआर

उपलब्ध एफआईआर के अनुसार, 27 मार्च 2023 को कानपुर के नौबस्ता थाने में अमर सिंह यादव के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था। शिकायतकर्ता महिला ने आरोप लगाया था कि धार्मिक स्थल से लौटते समय आरोपी ने रास्ता रोककर उसका हाथ पकड़ा, जबरन खींचा, गलत नीयत से छुआ और विरोध करने पर जान से मारने की धमकी दी। इस मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 354 और 506 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था। मामला फिलहाल न्यायालय में विचाराधीन बताया जा रहा है।

नियुक्ति के बाद तेज हुई राजनीतिक चर्चा

करीब तीन साल बाद समाजवादी पार्टी ने अमर सिंह यादव को लोहिया वाहिनी का ग्रामीण जिला अध्यक्ष नियुक्त कर दिया। इस फैसले के बाद विपक्षी दलों ने सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी तेज है कि महिला से जुड़े गंभीर आरोपों का सामना कर चुके व्यक्ति को संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी क्यों दी गई।

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पार्टी के भीतर भी असंतोष की चर्चा

सूत्रों के अनुसार, इस नियुक्ति को लेकर समाजवादी पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं और संगठन के अन्य पदाधिकारियों में भी नाराजगी की चर्चा है। बताया जा रहा है कि इस पद के कई अन्य दावेदार भी थे, जिससे संगठन के भीतर असंतोष की स्थिति बनी हुई है।

अमर सिंह यादव ने क्या कहा?

फोन पर प्रतिक्रिया देते हुए अमर सिंह यादव ने सभी आरोपों को बेबुनियाद बताया। उनका कहना है कि उन्हें राजनीतिक साजिश के तहत झूठे मुकदमे में फंसाया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने उनके खिलाफ मामला दर्ज कराया और अब पार्टी में मिली नई जिम्मेदारी से असंतुष्ट कुछ लोग भी इस विवाद को हवा दे रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि मामला अदालत में विचाराधीन है और उन्हें न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है।

2027 चुनाव से पहले बढ़ सकती है सियासत

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले इस तरह के मुद्दे राजनीतिक बहस का हिस्सा बन सकते हैं। विपक्ष इसे महिला सुरक्षा और नैतिकता के सवाल से जोड़कर उठा सकता है, जबकि मामले की कानूनी स्थिति और अंतिम फैसला अदालत के अधिकार क्षेत्र में है।

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