
सरकारी नौकरियों के साथ अब निजी क्षेत्र में भी सामाजिक प्रतिनिधित्व की मांग तेज हो रही है। आरपीआई (अठावले) ने SC, ST और OBC समेत वंचित वर्गों के लिए आरक्षण की आवाज उठाई है। साथ ही पार्टी ने राष्ट्रीय स्तर पर संगठन विस्तार और 2 करोड़ नए सदस्य जोड़ने का लक्ष्य तय किया है।
निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग
रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (अठावले) ने सामाजिक प्रतिनिधित्व के मुद्दे को राष्ट्रीय राजनीति में और मजबूती से उठाने की तैयारी शुरू कर दी है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्यमंत्री रामदास अठावले ने कहा कि सरकारी क्षेत्र की तरह निजी क्षेत्र में भी अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, ओबीसी और अन्य वंचित वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।
‘सिर्फ सरकारी नौकरियों तक सीमित न रहे प्रतिनिधित्व’
दिल्ली के न्यू महाराष्ट्र सदन में आरपीआई की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के बाद अठावले ने कहा कि सामाजिक रूप से पिछड़े और वंचित वर्गों की भागीदारी केवल सरकारी संस्थानों और नौकरियों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उनके मुताबिक निजी क्षेत्र में भी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की जरूरत है। पार्टी लंबे समय से निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग करती रही है।

राष्ट्रीय पार्टी बनने का लक्ष्य
आरपीआई ने आने वाले वर्षों में राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल करने का लक्ष्य रखा है। अठावले के मुताबिक संगठन देश के सभी 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों में सक्रिय है। नागालैंड और मणिपुर में पार्टी के प्रदर्शन के बाद संगठन अपने राजनीतिक आधार को और विस्तार देने की रणनीति बना रहा है।
2 करोड़ नए सदस्यों को जोड़ने की तैयारी
पार्टी जल्द देशव्यापी सदस्यता अभियान शुरू करेगी। इसके तहत 2 करोड़ नए सदस्यों को आरपीआई से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है। अठावले ने स्पष्ट किया कि उद्देश्य सिर्फ सदस्य संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि राज्य, जिला, विधानसभा और बूथ स्तर तक मजबूत संगठन तैयार करना है।
आंबेडकर के विचार होंगे आधार
अठावले ने कहा कि डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचार आरपीआई की वैचारिक ताकत हैं। संविधान, समानता, स्वतंत्रता, बंधुता और सामाजिक न्याय को पार्टी अपनी राजनीति का आधार बनाए रखेगी। उन्होंने कार्यकर्ताओं से स्थानीय समस्याओं पर सक्रिय रहने और जनता के साथ लगातार संवाद बनाए रखने की अपील की।
सामाजिक प्रतिनिधित्व से राष्ट्रीय विस्तार तक
आरपीआई की नई रणनीति दो मोर्चों पर आगे बढ़ती दिख रही है—एक तरफ वंचित वर्गों के सामाजिक और आर्थिक प्रतिनिधित्व का मुद्दा, तो दूसरी तरफ संगठन का देशव्यापी विस्तार। अब देखना होगा कि निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग और 2 करोड़ सदस्य जोड़ने का अभियान पार्टी को राष्ट्रीय राजनीति में कितनी मजबूती देता है। यही कोशिश आने वाले वर्षों में आरपीआई की राजनीतिक पहचान और प्रभाव की दिशा तय कर सकती है।
