
मध्य प्रदेश के बालाघाट में 30 से अधिक आदिवासी बच्चों की मौत ने दूरदराज के इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं की हकीकत सामने ला दी है। बीमारी, कुपोषण, एनीमिया और उपचार तक सीमित पहुंच के बीच मामला अब हाईकोर्ट की निगरानी में है।
30 से ज्यादा बच्चों की मौत ने बढ़ाई चिंता
बालाघाट के आदिवासी बहुल इलाकों में जून-जुलाई से बच्चों की मौत की खबरें सामने आती रही हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, प्रभावित बच्चों में बुखार, खसरा, मलेरिया, सांस संबंधी परेशानी, डिहाइड्रेशन और गंभीर कुपोषण जैसी स्थितियां सामने आईं। हालांकि, अधिकारियों की ओर से किसी एक बीमारी को सभी मौतों की एकमात्र वजह नहीं बताया गया है।
बीमारी के साथ कुपोषण बना बड़ी चुनौती
बैगा और गोंड आबादी वाले दूरदराज के गांवों में स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच आसान नहीं है। रिपोर्टों में कुपोषण और एनीमिया से जूझ रहे बच्चों का भी उल्लेख है। ऐसे में संक्रमण या दूसरी बीमारी होने पर बच्चों की स्थिति तेजी से गंभीर होने का खतरा बढ़ जाता है।
दूषित पानी और पोषण संबंधी समस्याओं के आरोपों ने इस संकट को सिर्फ बीमारी का मामला नहीं रहने दिया, बल्कि बुनियादी सुविधाओं पर भी सवाल खड़े किए हैं।

50 बेड के अस्पताल में 400 बच्चों का दावा
मामले में दायर जनहित याचिका में दावा किया गया कि करीब 50 बेड की क्षमता वाले अस्पताल में लगभग 400 बच्चों का इलाज किया गया। याचिका में प्रभावित क्षेत्रों में पेयजल और पोषण व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठाए गए। इन दावों के बीच हाईकोर्ट ने मामले को गंभीरता से लिया है।
हाईकोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर खंडपीठ ने राज्य के स्वास्थ्य विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग, बालाघाट कलेक्टर और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने मामले से जुड़ी रिपोर्ट और दस्तावेज रिकॉर्ड पर रखने को कहा है। अगली सुनवाई 18 सितंबर को निर्धारित है।
राहुल गांधी ने सरकार पर साधा निशाना
मामले को लेकर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भी मध्य प्रदेश सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने X पर बच्चों की मौतों को स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी से जोड़ते हुए सरकार की प्रतिक्रिया पर सवाल उठाए। उनके बयान में सरकार की आलोचना के साथ राज्य की स्वास्थ्य और अन्य व्यवस्थाओं को लेकर भी आरोप लगाए गए।
अब असली सवाल जवाबदेही का
प्रशासन की ओर से प्रभावित गांवों में स्वास्थ्य जांच, निगरानी और अन्य कदम उठाए जा रहे हैं। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल छोड़ दिया है—क्या दूरदराज के आदिवासी इलाकों तक समय पर डॉक्टर, दवाएं, पोषण और सुरक्षित पेयजल पहुंच पा रहे हैं?बालाघाट की त्रासदी को केवल आंकड़ों में देखना पर्याप्त नहीं है। हर मौत के पीछे एक परिवार और एक अधूरी जिंदगी है। अब हाईकोर्ट की सुनवाई और सरकारी रिपोर्ट से यह स्पष्ट होना महत्वपूर्ण होगा कि इन मौतों के वास्तविक कारण क्या थे और भविष्य में ऐसी स्थिति रोकने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाएंगे।
