
बिहार की राजनीति एक बार फिर संवैधानिक बहस के केंद्र में आ गई है। बिना विधायक या विधान परिषद सदस्य बने मंत्री पद संभाल रहे दीपक प्रकाश की दोबारा नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सवाल उठे हैं। अब इस मामले पर अदालत की नजर है और इसके दूरगामी राजनीतिक असर हो सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को बिहार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए बिहार सरकार. दीपक प्रकाश और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया। अदालत ने सभी पक्षों से इस मामले में जवाब दाखिल करने को कहा है। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने यह भी पूछा कि क्या दीपक प्रकाश अभी भी मंत्री पद पर बने हुए हैं।
क्या है पूरा विवाद
विवाद की जड़ संविधान के अनुच्छेद 164(4) में है। इस प्रावधान के अनुसार कोई भी व्यक्ति विधायक या विधान परिषद सदस्य बने बिना अधिकतम छह महीने तक मंत्री रह सकता है। इस अवधि के भीतर उसे किसी सदन का सदस्य बनना जरूरी होता है। याचिका में दावा किया गया है कि यह छूट सीमित अवधि के लिए होती है और इसे बार बार इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

नियुक्ति और पुनर्नियुक्ति पर सवाल
याचिका के अनुसार 20 नवंबर 2025 को तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दीपक प्रकाश को मंत्री पद की शपथ दिलाई थी। उस समय वह किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे। बाद में सरकार गिर गई और मंत्रिपरिषद भंग हो गई। इसके बाद 7 मई 2026 को नई सरकार बनने पर उन्हें फिर से मंत्री बना दिया गया। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह कदम संवैधानिक प्रावधानों की भावना के खिलाफ है।
पुराने फैसले का हवाला
याचिका में सुप्रीम कोर्ट के चर्चित मामले एस.आर. चौधरी बनाम पंजाब राज्य का उल्लेख किया गया है। उस फैसले में अदालत ने स्पष्ट किया था कि छह महीने की अवधि को नए सिरे से शुरू नहीं किया जा सकता। चाहे मुख्यमंत्री बदल जाए. मंत्रिमंडल में फेरबदल हो जाए या नई सरकार बन जाए।
लोकतांत्रिक व्यवस्था पर बहस
याचिकाकर्ता का तर्क है कि यदि किसी निर्वाचित प्रतिनिधि के बिना मंत्री पद लगातार बनाए रखा जाता है तो यह संसदीय लोकतंत्र और जवाबदेही की भावना को कमजोर करता है। इसी आधार पर अदालत से ‘क्वो वारंटो’ रिट जारी करने की मांग की गई है ताकि यह तय हो सके कि दीपक प्रकाश किस अधिकार के तहत मंत्री पद पर बने हुए हैं।
