
राज्यसभा की राजनीति में सोमवार को बड़ा बदलाव देखने को मिला जब सभापति सीपी राधाकृष्णन ने आम आदमी पार्टी के बागी गुट के भारतीय जनता पार्टी में विलय को औपचारिक मंजूरी दे दी। पिछले सप्ताह आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सांसदों ने पार्टी छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया था। इसके बाद AAP ने उनकी सदस्यता रद्द करने की मांग उठाई थी लेकिन सभापति के फैसले के बाद यह मामला पूरी तरह नए राजनीतिक मोड़ पर पहुंच गया है। राज्यसभा सचिवालय की ओर से इस संबंध में आधिकारिक अधिसूचना भी जारी कर दी गई है जिससे सदन में राजनीतिक समीकरण बदल गए हैं।
भाजपा की ताकत में इजाफा और AAP को झटका
इस विलय के बाद राज्यसभा में भारतीय जनता पार्टी की स्थिति और मजबूत हो गई है। अब भाजपा के सांसदों की संख्या बढ़कर 113 तक पहुंच गई है जो उसके लिए एक बड़ी संसदीय मजबूती मानी जा रही है। दूसरी ओर आम आदमी पार्टी को बड़ा नुकसान हुआ है और उसके पास अब सिर्फ तीन राज्यसभा सांसद बचे हैं। जिन सात सांसदों ने पार्टी छोड़ी उनमें से छह पंजाब से राज्यसभा सदस्य थे। इस घटनाक्रम ने विपक्षी राजनीति में हलचल पैदा कर दी है और आने वाले समय में इसके असर को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।

पार्टी छोड़ने वाले सांसदों के आरोप और राजनीतिक बयानबाजी
पिछले सप्ताह जब सातों सांसदों ने आम आदमी पार्टी से अलग होने का ऐलान किया था तब उन्होंने पार्टी नेतृत्व पर गंभीर आरोप लगाए थे। सांसदों का कहना था कि अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में पार्टी अपने मूल सिद्धांतों और नैतिक मूल्यों से भटक गई है। इसी आधार पर उन्होंने भाजपा में शामिल होने का फैसला लिया। इस बीच बलबीर सिंह सीचेवाल ने यह भी दावा किया कि सांसद विक्रमजीत सिंह साहनी ने उन्हें भी इस गुट में शामिल होने का प्रस्ताव दिया था लेकिन उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया। इस पूरे घटनाक्रम ने राजनीतिक हलकों में बहस को और तेज कर दिया है।
AAP की अयोग्यता मांग और कानूनी लड़ाई की तैयारी
आम आदमी पार्टी ने इस विलय को दल बदल कानून का उल्लंघन बताते हुए राज्यसभा सभापति से सातों सांसदों को अयोग्य घोषित करने की मांग की है। पार्टी के वरिष्ठ सांसद संजय सिंह ने इस संबंध में पत्र लिखकर कहा है कि ये सभी सांसद AAP के टिकट पर चुने गए थे और बाद में पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए जो दल-बदल की श्रेणी में आता है। उन्होंने यह भी कहा कि आवश्यकता पड़ने पर पार्टी इस मामले को अदालत तक ले जाएगी। वहीं सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए AAP का दावा है कि ऐसे मामलों में सदस्यता रद्द की जा सकती है। अब यह मामला राजनीतिक के साथ-साथ कानूनी स्तर पर भी गरमाता दिख रहा है।
