
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्षी दलों की मुहिम अब चुनाव आयोग की निष्पक्षता, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया जैसे मुद्दों से जुड़ गई है। केरल विधानसभा में उन्हें पद से हटाने की मांग वाले प्रस्ताव की खबर ने इस विवाद को नया राजनीतिक आयाम दिया है। लेकिन 23 दलों की एकजुटता के दावे और उससे जुड़े घटनाक्रमों को समझने के लिए आधिकारिक रिकॉर्ड और राजनीतिक आरोपों में अंतर करना जरूरी है।
केरल विधानसभा के प्रस्ताव में क्या कहा गया?
आपके दिए गए विवरण के मुताबिक, 13 अक्टूबर 2026 को केरल विधानसभा में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग वाला प्रस्ताव पेश किया गया। प्रस्ताव को कांग्रेस के नेतृत्व वाले UDF ने आगे बढ़ाया और वामपंथी दलों के नेतृत्व वाले LDF ने भी समर्थन दिया।
प्रस्ताव में तीन प्रमुख मांगें बताई गई हैं—ज्ञानेश कुमार को पद से हटाना, SIR के दौरान मतदाता सूची से हटाए गए पात्र मतदाताओं के मतदान अधिकार बहाल करना और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करने वाली समिति की संरचना में बदलाव करना।
नियुक्ति समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश को शामिल करने की मांग भी उठाई गई है। प्रस्ताव के समर्थकों का तर्क है कि इससे चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को मजबूत किया जा सकता है। हालांकि, विधानसभा में प्रस्ताव पारित होना अपने आप में मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने का अंतिम संवैधानिक फैसला नहीं है।
ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कौन-कौन से दल उठा रहे हैं आवाज?
विपक्षी एकजुटता की चर्चा में कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, वामपंथी दल, समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी, शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे), राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार), बीजू जनता दल और तमिलगा वेत्री कड़गम जैसे दलों के नाम शामिल हैं।
इन दलों की भूमिका और विरोध का स्वरूप एक जैसा नहीं है। कुछ ने विपक्षी गठबंधन के कार्यक्रमों में हिस्सा लिया है, जबकि कुछ ने अपने स्तर पर विरोध दर्ज कराया है। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) भी ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रही है। हालांकि, CJP के कार्यक्रमों और कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्षी मार्च को एक ही आंदोलन मानना सही नहीं होगा।
चुनाव आयोग के भीतर असहमति की रिपोर्ट ने क्यों बढ़ाई बहस?
इस विवाद में एक अहम पहलू चुनाव आयोग के भीतर दर्ज असहमतियों से जुड़ा है। द इंडियन एक्सप्रेस की 25 सितंबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में SIR से संबंधित फैसलों पर कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज की थीं।

रिपोर्ट में मतदाता सूची के प्रबंधन, नए मतदाताओं के नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया तथा सॉफ्टवेयर पर नियंत्रण जैसे मुद्दों का उल्लेख किया गया। चुनाव आयोग ने इन टिप्पणियों को निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बताते हुए कहा था कि फैसले सर्वसम्मति से लिए गए। इसलिए इन आपत्तियों को गंभीर संस्थागत सवालों के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन इन्हें अपने आप में चुनावी धांधली का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता।
SIR और मतदाता सूची पर इतना विवाद क्यों?
विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR का उद्देश्य मतदाता सूची की जांच और उसे अपडेट करना है। विवाद इस बात पर है कि इस प्रक्रिया में पात्र मतदाताओं के नाम गलत तरीके से तो नहीं हटाए गए।
विपक्ष का आरोप है कि बड़े पैमाने पर नाम हटने से मताधिकार प्रभावित हो सकता है और प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठते हैं। दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने प्रक्रिया का बचाव किया है। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की प्रारूप मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए गए थे। यह आंकड़ा अपने आप में यह नहीं बताता कि सभी नाम पात्र मतदाताओं के थे या सभी को गलत तरीके से हटाया गया।
क्या विपक्ष की एकजुटता स्थायी साबित होगी?
ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध ने अलग-अलग विचारधारा वाले दलों को चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और SIR जैसे मुद्दों पर साथ आने का अवसर दिया है। लेकिन किसी मुद्दे पर साझा विरोध होना और चुनावी गठबंधन बनाना अलग बातें हैं।
सीट बंटवारे, राज्यों में क्षेत्रीय हितों और नेतृत्व को लेकर दलों के बीच मतभेद बने रह सकते हैं। इसलिए विपक्ष की मौजूदा एकजुटता को भविष्य के चुनावों में स्थायी गठबंधन या किसी निश्चित चुनावी नतीजे का संकेत नहीं माना जा सकता।
आगे क्या होगा?
केरल विधानसभा का प्रस्ताव, विपक्षी नेताओं के प्रदर्शन और चुनाव आयोग के भीतर दर्ज असहमतियों ने इस विवाद को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। अब महत्वपूर्ण सवाल यह है कि पात्र मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा, SIR की पारदर्शिता और चुनाव आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता से जुड़े मुद्दों पर क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं।
अंततः, लोकतंत्र में चुनाव आयोग पर सवाल उठाना और उन सवालों की निष्पक्ष जांच होना दोनों महत्वपूर्ण हैं। राजनीतिक आरोपों से आगे बढ़कर आधिकारिक रिकॉर्ड, कानूनी प्रक्रिया और प्रमाणित तथ्यों के आधार पर ही इस विवाद का मूल्यांकन किया जाना चाहिए।
