
पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 से पहले राज्य की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा हो गया है। पंजाब के पूर्व उपमुख्यमंत्री और गुरदासपुर से सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा ने स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR अभियान पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि चुनाव से कुछ महीने पहले मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण की प्रक्रिया शुरू करना लोकतांत्रिक व्यवस्था पर संदेह पैदा करता है। रंधावा ने आरोप लगाया कि इस कदम के पीछे राजनीतिक मंशा हो सकती है और चुनाव आयोग को इस पूरे मामले पर स्पष्ट जवाब देना चाहिए।
चुनाव से पहले SIR लागू करने पर उठे सवाल
रंधावा ने अपने बयान में कहा कि पंजाब में विधानसभा चुनावों के लिए अब दस महीने से भी कम समय बचा है। ऐसे समय में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण की प्रक्रिया शुरू करना कई सवाल खड़े करता है। उन्होंने पूछा कि जब पंजाब और उत्तर प्रदेश में लगभग एक ही समय पर चुनाव होने हैं तो फिर SIR प्रक्रिया पंजाब में अभी क्यों लागू की जा रही है। उनका कहना है कि यदि चुनाव आयोग का उद्देश्य मतदाता सूचियों को पारदर्शी और त्रुटिरहित बनाना है तो यह प्रक्रिया चुनाव के बाद भी कराई जा सकती थी। चुनाव से ठीक पहले इस तरह की कार्रवाई लोगों के बीच राजनीतिक हस्तक्षेप की आशंका बढ़ाती है।

भाजपा और केंद्र सरकार पर लगाए गंभीर आरोप
पूर्व उपमुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी केंद्र सरकार के प्रभाव का इस्तेमाल चुनावी प्रक्रियाओं में अपने राजनीतिक हितों के लिए करना चाहती है। उन्होंने कहा कि बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भी मतदाता सूचियों को लेकर गंभीर शिकायतें सामने आ चुकी हैं। रंधावा ने चेतावनी देते हुए कहा कि पंजाब में किसी भी वास्तविक मतदाता का नाम सूची से हटाने या उसे मतदान के अधिकार से वंचित करने की कोशिश बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने दावा किया कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए कांग्रेस हर स्तर पर आवाज उठाएगी।
कांग्रेस ने कार्यकर्ताओं को दी निगरानी की जिम्मेदारी
सुखजिंदर सिंह रंधावा ने कहा कि कांग्रेस पार्टी गांव गांव और शहर शहर अपने कार्यकर्ताओं के माध्यम से निगरानी करेगी ताकि कोई भी पात्र मतदाता अपने अधिकार से वंचित न रहे। उन्होंने सभी विपक्षी दलों से भी अपील की कि वे मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुट हों। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले महीनों में SIR प्रक्रिया पंजाब की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन सकती है। चुनावी माहौल में इस बहस के और तेज होने की संभावना जताई जा रही है क्योंकि मतदाता सूची का मुद्दा सीधे चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकता है।
