
DELHI NEWS(Globl times): दिल्ली का रामलीला मैदान एक बार फिर चर्चा में है। हाल ही में यहां इंडिया गठबंधन की बड़ी रैली हुई जिसके बाद कांग्रेस और भाजपा के बीच रैली की सफलता को लेकर बयानबाजी शुरू हो गई। कांग्रेस ने लोगों का धन्यवाद किया तो भाजपा ने खाली कुर्सियों को दिखाकर रैली पर सवाल उठाए। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस मैदान में आज बड़े बड़े राजनीतिक आंदोलन होते हैं उसका रिश्ता मुगल शासन के दौर से भी जुड़ा हुआ है। रामलीला मैदान का इतिहास काफी पुराना और दिलचस्प है।
बताया जाता है कि दिल्ली में रामलीला की परंपरा मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के समय में आगे बढ़ी थी। वह आखिरी मुगल बादशाह थे। माना जाता है कि करीब 1835 के आसपास दिल्ली में रामलीला का मंचन शुरू हुआ था। मुगल सेना में काम करने वाले हिंदू सैनिक लाल किले के पीछे यमुना नदी के रेतीले किनारे पर रामलीला किया करते थे।
उस समय बहादुर शाह जफर ने भी इस आयोजन में दिलचस्पी दिखाई थी। इतिहास से जुड़ी जानकारी के मुताबिक उन्होंने रामलीला की शोभायात्रा का रास्ता बदलवाया था ताकि महल से वह इस आयोजन को देख सकें। कुछ ऐतिहासिक जानकारियां इसकी शुरुआत 1850 के दशक में भी बताती हैं इसलिए इसके पहले प्रदर्शन की तारीख को लेकर अलग अलग विवरण मिलते हैं।
आज जिस जगह को रामलीला मैदान के नाम से जाना जाता है वहां पहले एक बड़ा तालाब हुआ करता था। इसे शाहजी का तालाब कहा जाता था। बाद में इस तालाब को भरकर मैदान बनाया गया। 1930 के दशक में यहां रामलीला का आयोजन शुरू हुआ और धीरे धीरे यह जगह देशभर में अपनी अलग पहचान बनाने लगी।
समय के साथ इस मैदान का महत्व सिर्फ धार्मिक आयोजनों तक सीमित नहीं रहा। आजादी के बाद यहां कई बड़ी राजनीतिक रैलियां और आंदोलन हुए। साल 1975 में जयप्रकाश नारायण ने यहां बड़ी सभा की थी। इसके अलावा 2011 में अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन भी इसी मैदान से देशभर में चर्चा में आया था।
यही वजह है कि दिल्ली का यह मैदान धार्मिक परंपरा के साथ साथ देश की राजनीति के इतिहास में भी खास जगह रखता है। आज भी यहां होने वाली हर बड़ी रैली पर पूरे देश की नजर रहती है।
