
राष्ट्रीय लोकदल की एकता रैली की शुरुआत के साथ ही पश्चिम उत्तर प्रदेश की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। रालोद और भाजपा के बीच सीट बंटवारे को लेकर चर्चाओं ने जोर पकड़ लिया है। जिन सीटों पर अब तक भाजपा का दबदबा रहा है, वहां भी रालोद ने अपनी दावेदारी मजबूत करनी शुरू कर दी है। इससे आगामी विधानसभा चुनाव से पहले दोनों दलों के बीच सियासी समीकरण बदलने के संकेत मिल रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में इसे बड़े टकराव की शुरुआत माना जा रहा है।
2022 के प्रदर्शन के बाद रालोद की बढ़ी महत्वाकांक्षा
2022 के विधानसभा चुनाव में सपा के साथ गठबंधन में रालोद ने 32 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 8 सीटों पर जीत दर्ज की थी। वहीं 2017 में केवल एक सीट जीतने के बाद पार्टी लगातार अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में जुटी रही है। अब केंद्रीय मंत्री जयंत चौधरी के नेतृत्व में रालोद खुद को पश्चिम यूपी की मजबूत क्षेत्रीय ताकत के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रही है। यही वजह है कि इस बार पार्टी ज्यादा सीटों पर दावा ठोकने के मूड में दिख रही है।

मेरठ–मुजफ्फरनगर–अलीगढ़ की सीटों पर बढ़ी निगाहें
मेरठ की सिवालखास, किठौर और सरधना सीटें सबसे ज्यादा चर्चा में हैं। सिवालखास से रालोद पहले भी जीत चुकी है और अब यहां फिर से मजबूत दावेदारी कर रही है। सरधना सीट पर भाजपा के पूर्व विधायक संगीत सोम सक्रिय हैं, जिससे मुकाबला और दिलचस्प हो गया है। मुजफ्फरनगर, शामली और गाजियाबाद की सीटों पर भी रालोद की नजर है, खासकर त्यागी और किसान बहुल क्षेत्रों में पार्टी अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है।
2027 के लिए गठबंधन और रणनीति पर सबकी नजर
रालोद की रणनीति केवल सीटों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह 2027 के चुनाव में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की तैयारी में है। पश्चिम यूपी की 71 सीटों में से अधिक हिस्सेदारी की मांग पार्टी के अंदर जोर पकड़ रही है। दूसरी ओर भाजपा भी अपनी मौजूदा सीटें छोड़ने के मूड में नहीं दिख रही है। ऐसे में दोनों दलों के बीच बातचीत और टकराव आने वाले दिनों में और बढ़ सकता है, जिससे राज्य की राजनीति में नया समीकरण बनता दिख रहा है।
