भ्रष्टाचार और बेरोजगारी पर जनता का फैसला, बंगाल में नया बदलाव

पश्चिम बंगाल की राजनीति ने एक बार फिर बड़ा मोड़ ले लिया है। 34 सालों के लेफ्ट शासन के बाद 2011 में ममता बनर्जी ने “मां, माटी, मानुष” के नारे के साथ सत्ता हासिल की थी। लेकिन अब 15 साल बाद वही सत्ता एंटी इनकंबेंसी की चपेट में आती दिख रही है। शुरुआती रुझानों में बीजेपी को ऐतिहासिक बढ़त मिलती दिख रही है जबकि तृणमूल कांग्रेस की स्थिति कमजोर नजर आ रही है। यह बदलाव राज्य की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत का संकेत माना जा रहा है।
विकास बनाम भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जनता का बड़ा फैसला
इस चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा विकास, भ्रष्टाचार और कानून-व्यवस्था रहा। बीजेपी ने ममता सरकार पर सिंडिकेट राज, परिवारवाद और भ्रष्टाचार के आरोपों को केंद्र में रखकर आक्रामक प्रचार किया। वहीं तृणमूल कांग्रेस का दावा था कि उन्होंने राज्य को सामाजिक योजनाओं से मजबूत किया है। लेकिन बेरोजगारी, उद्योगों की कमी और निवेश के अभाव ने जनता के रुख को प्रभावित किया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विकास के मुद्दे पर बीजेपी को बड़ा समर्थन मिला है।

वोट बैंक में सेंध और बदलते सामाजिक समीकरण
इस चुनाव में सबसे बड़ा बदलाव वोट बैंक में देखा जा रहा है। मुस्लिम बहुल जिलों जैसे मालदा और मुर्शिदाबाद में भी बीजेपी को बढ़त मिलती दिखी है, जिससे यह संकेत मिलता है कि पारंपरिक वोट बैंक में दरार आई है। एससी-एसटी और चाय बागान श्रमिकों सहित कई समुदायों का समर्थन भी बीजेपी की ओर जाता दिख रहा है। महिलाओं के बीच भी इस बार ममता सरकार की पकड़ कमजोर हुई है, जबकि बीजेपी की योजनाओं को लेकर भरोसा बढ़ा है।
संगठन, भ्रष्टाचार और एंटी इनकंबेंसी ने बदला चुनावी समीकरण
विशेषज्ञों का मानना है कि आरजी कर केस, शिक्षक भर्ती घोटाला और प्रशासनिक असंतोष ने तृणमूल कांग्रेस की छवि को नुकसान पहुंचाया। वहीं बीजेपी ने मजबूत संगठनात्मक रणनीति के जरिए जमीन पर पकड़ बनाई। केंद्रीय बलों की तैनाती और सख्त चुनावी निगरानी ने भी मतदाताओं को निर्भीक होकर वोट डालने का अवसर दिया। 90 के दशक में एक विधायक वाली बीजेपी अब राज्य में सरकार बनाने की स्थिति तक पहुंचती दिख रही है, जो बंगाल की राजनीति में ऐतिहासिक बदलाव माना जा रहा है।
