
बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर राजनीतिक बहस एक बार फिर तेज होती दिखाई दे रही है। भाकपा माले ने पटना में जनसुनवाई आयोजित कर आरोप लगाया कि SIR के दौरान कई ऐसे लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए, जो जीवित हैं और मतदान के पात्र हैं। कार्यक्रम में पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य के साथ कांग्रेस और राजद से जुड़े नेता भी मौजूद रहे।
110 बूथों के सर्वे का दावा
दीपांकर भट्टाचार्य ने जनसुनवाई के दौरान दावा किया कि भाकपा माले ने बिहार के 10 विधानसभा क्षेत्रों के 110 बूथों पर घर-घर जाकर जानकारी जुटाई है। उनके मुताबिक, इस सर्वे में औसतन 20 प्रतिशत लोगों के नाम ऐसे मिले, जिन्हें उचित कारण के बिना मतदाता सूची से हटाया गया।
भट्टाचार्य ने दावा किया कि SIR के दौरान करीब 70 लाख नाम हटाए गए और इनमें लगभग 15 लाख नाम गलत तरीके से काटे गए। हालांकि, ये आंकड़े पार्टी के सर्वे और दावे पर आधारित हैं।

‘रिकॉर्ड में मृत, लेकिन लोग जिंदा’
जनसुनवाई में कुछ ऐसे लोग भी पहुंचे, जिन्होंने दावा किया कि वे जीवित होने के बावजूद मतदाता सूची से बाहर हो गए।
रामसूरत चौधरी ने बताया कि जब वह मतदान करने पहुंचे तो उन्हें पता चला कि उनका नाम वोटर लिस्ट में नहीं है। उन्होंने अपनी 1994 में जारी वोटर आईडी भी जनसुनवाई में प्रस्तुत की।
इसी तरह सुरेश भगत 2004 में जारी वोटर आईडी लेकर पहुंचे। उनका दावा था कि SIR के दौरान उन्होंने आवश्यक फॉर्म भरा था, इसके बावजूद उनका नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया।
इन मामलों के आधार पर भाकपा माले ने मतदाता सूची में हुई कथित गड़बड़ियों की जांच और प्रभावित लोगों के नाम दोबारा जोड़ने की मांग उठाई।
चुनाव आयोग के आंकड़े क्या कहते हैं?
निर्वाचन आयोग के अनुसार, 24 जून 2025 को बिहार की मतदाता सूची में करीब 7.89 करोड़ मतदाता थे। SIR के ड्राफ्ट चरण में लगभग 65 लाख नाम हटाए गए थे। आयोग ने बताया था कि इनमें मृत मतदाता, स्थायी रूप से स्थानांतरित मतदाता और एक से अधिक जगह पंजीकृत मतदाता शामिल थे।
इसके बाद दावों और आपत्तियों की प्रक्रिया में 21.53 लाख पात्र मतदाताओं के नाम जोड़े गए, जबकि 3.66 लाख नाम और हटाए गए। 30 सितंबर 2025 को प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में करीब 7.42 करोड़ मतदाता थे।
आयोग ने यह भी कहा था कि राजनीतिक दलों को बूथ स्तर पर उन मतदाताओं की सूचियां उपलब्ध कराई गई थीं, जिनके नाम ड्राफ्ट सूची में नहीं थे, ताकि संभावित गलतियों की पहचान की जा सके।
‘जनसुनवाई सिर्फ शुरुआत’
दीपांकर भट्टाचार्य ने कहा कि पटना में आयोजित जनसुनवाई केवल शुरुआत है। उन्होंने दावा किया कि SIR के दौरान जुड़े नए नामों का भी पूरा और सही डेटा सामने नहीं आया है।
उनके मुताबिक, मतदाता सूची में बदलाव का असर उन विधानसभा क्षेत्रों में भी पड़ सकता है, जहां चुनावी मुकाबला कम अंतर का रहता है। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी इस मुद्दे को आगे भी उठाती रहेगी।
2 से 8 अक्टूबर तक विरोध कार्यक्रम का दावा
भाकपा माले नेता ने कहा कि 2 अक्टूबर से 8 अक्टूबर तक चुनाव आयोग और SIR के मुद्दे पर विरोध कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। उन्होंने कहा कि इस विषय पर आंदोलन करने वाले संगठनों को भाकपा माले समर्थन देगी।
वहीं, निर्वाचन आयोग की आधिकारिक प्रक्रिया के मुताबिक SIR के दौरान पात्र मतदाताओं के नाम जोड़ने और गलत तरीके से हटाए गए नामों पर दावा-आपत्ति की व्यवस्था मौजूद थी। आयोग ने यह भी कहा था कि ड्राफ्ट सूची से किसी नाम को बिना जांच, आदेश और प्रभावित व्यक्ति को उचित अवसर दिए हटाया नहीं जा सकता।
आगे भी जारी रह सकती है राजनीतिक बहस
बिहार की मतदाता सूची को लेकर भाकपा माले के आरोप और निर्वाचन आयोग के आधिकारिक आंकड़े अब राजनीतिक बहस का हिस्सा हैं। भाकपा माले जहां अपने बूथ सर्वे के आधार पर कथित गलत नाम कटने का मुद्दा उठा रही है, वहीं आयोग SIR के दौरान अपनाई गई प्रक्रिया और उपलब्ध कराए गए दावों-आपत्तियों के अवसर का हवाला देता रहा है।
अब जनसुनवाई में सामने आए मामलों की आधिकारिक स्तर पर जांच और उनके रिकॉर्ड से मिलान से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि कितने नाम वास्तव में गलत तरीके से हटे और कितने मामले रिकॉर्ड संबंधी अन्य कारणों से जुड़े थे।
