राज्यराजनीति

पंजाब के मंत्री संजीव अरोड़ा को हाई कोर्ट से झटका, PMLA मामले में जमानत याचिका खारिज

पंजाब के कैबिनेट मंत्री और आम आदमी पार्टी नेता संजीव अरोड़ा को पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। कोर्ट ने PMLA मामले में उनकी नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी। अरोड़ा ने अपनी गिरफ्तारी, गिरफ्तारी के आधार और रिमांड आदेश को चुनौती देते हुए राहत की मांग की थी। अब उनके पास सुप्रीम कोर्ट का रुख करने का विकल्प है।

हाई कोर्ट में खारिज हुई जमानत अर्जी

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने शुक्रवार को संजीव अरोड़ा की नियमित जमानत याचिका पर फैसला सुनाया। अरोड़ा ने प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट, 2002 (PMLA) के तहत हुई गिरफ्तारी को चुनौती दी थी।

उनकी ओर से अदालत में दलील दी गई कि गिरफ्तारी के दौरान कानूनी सुरक्षा उपायों और मौलिक अधिकारों का पालन नहीं किया गया। याचिका में गिरफ्तारी के आधार और रिमांड आदेश को भी रद्द करने की मांग की गई थी।

संजीव अरोड़ा ने कोर्ट में क्या दलील दी?

अरोड़ा की ओर से कहा गया कि वह पंजाब सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं और इससे पहले राज्यसभा सांसद भी रह चुके हैं। उनके वकीलपंजाब के मंत्री संजीव अरोड़ा को हाई कोर्ट से झटका, PMLA मामले में जमानत याचिका खारिज ने उनकी सामाजिक स्थिति और सार्वजनिक जीवन का हवाला देते हुए कहा कि उनका रिकॉर्ड बेदाग रहा है।

याचिका के मुताबिक, अरोड़ा 9 मई से हिरासत में हैं। इससे पहले गुरुग्राम स्थित PMLA विशेष अदालत में दायर उनकी नियमित जमानत याचिका 15 जून को खारिज हो चुकी थी।

 

HSRL कंपनी से जुड़ा है मामला

अरोड़ा ने अदालत को बताया कि वह Hampton Sky Realty Limited (HSRL) के प्रमोटर और चेयरमैन हैं। उनके मुताबिक, यह कंपनी 1987 में स्थापित हुई थी और विभिन्न व्यावसायिक गतिविधियों में काम करती है।

उनकी ओर से यह भी दलील दी गई कि पंजाब सरकार में कैबिनेट मंत्री बनने के बाद उन्होंने कंपनी के रोजमर्रा के कामकाज में हिस्सा लेना बंद कर दिया था।

‘PMLA के तहत अपराध के जरूरी तत्व साबित नहीं’

अरोड़ा की याचिका में अभियोजन पक्ष के मामले पर भी सवाल उठाए गए। उनका दावा था कि जांच एजेंसी यह साबित करने में विफल रही है कि कोई ऐसा ‘scheduled offence’ हुआ, जिससे अपराध से प्राप्त आय पैदा हुई और जिसका संबंध उनसे स्थापित किया जा सके।

याचिका में कहा गया कि जांच के दौरान सामने आए साक्ष्यों से यह साबित नहीं होता कि उन्होंने कथित अपराध से प्राप्त आय को छिपाया, अपने कब्जे में रखा, हासिल किया, इस्तेमाल किया या उसे वैध दिखाने की कोशिश की।

‘ED की तलाशी में नहीं मिला आपत्तिजनक सबूत’

अरोड़ा की ओर से यह भी दावा किया गया कि प्रवर्तन निदेशालय ने उनके घर, उनके बेटे के आवास और HSRL के कार्यालय में व्यापक तलाशी ली थी।

याचिका के अनुसार, तलाशी के दौरान कोई आपत्तिजनक दस्तावेज, बेहिसाबी संपत्ति, डिजिटल रिकॉर्ड या ऐसा अन्य सबूत नहीं मिला, जिससे उनके खिलाफ अपराध में संलिप्तता साबित हो।

हालांकि, हाई कोर्ट ने उनकी नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी है। मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई और सुप्रीम कोर्ट में संभावित अपील पर अब नजर रहेगी।

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