बंगाल चुनाव से पहले वोटर लिस्ट विवाद, SIR पर BJP-TMC आमने-सामने

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर राज्य की राजनीति में बड़ा बवाल खड़ा हो गया है। चुनाव आयोग द्वारा किए गए इस विशेष पुनरीक्षण अभियान में करीब 90 से 91 लाख वोटरों के नाम सूची से हटाए जाने के बाद सियासी माहौल गरमा गया है। यह मुद्दा अब चुनावी बहस के केंद्र में आ चुका है।
आंकड़ों के मुताबिक, इस प्रक्रिया के बाद राज्य में कुल मतदाताओं की संख्या लगभग 7.66 करोड़ से घटकर करीब 6.75 करोड़ रह गई है। हटाए गए नामों में लगभग 60 प्रतिशत हिंदू और बाकी अल्पसंख्यक, खासकर मुस्लिम समुदाय के बताए जा रहे हैं। हालांकि अधिकारियों का कहना है कि यह कार्रवाई पूरी तरह तकनीकी प्रक्रिया के तहत की गई है, जिसमें मृत्यु, स्थान परिवर्तन, डुप्लीकेट एंट्री और सत्यापन में असफल पाए गए नाम शामिल हैं।
इस पूरे मामले पर Mamata Banerjee और उनकी पार्टी All India Trinamool Congress (TMC) ने कड़ा विरोध जताया है। टीएमसी का आरोप है कि SIR का इस्तेमाल एक खास वोटर वर्ग को कमजोर करने के लिए किया जा रहा है। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव Abhishek Banerjee ने इसे लोकतंत्र के खिलाफ बताते हुए कहा कि अब वोटर सरकार नहीं चुन रहे, बल्कि सरकार तय करना चाहती है कि कौन वोटर रहेगा।
दूसरी ओर, Bharatiya Janata Party (BJP) ने इस प्रक्रिया का समर्थन किया है। केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah ने SIR को जरूरी कदम बताते हुए कहा कि इसका उद्देश्य घुसपैठियों और अवैध मतदाताओं को हटाना है। उन्होंने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और चुनावी पारदर्शिता से जुड़ा अहम मुद्दा बताया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इतने बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने का सीधा असर चुनाव परिणामों पर पड़ सकता है। लगभग 12 प्रतिशत मतदाताओं की कमी किसी भी पार्टी के समीकरण बदल सकती है।
जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, SIR का मुद्दा और गरमाता जा रहा है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि यह विवाद जनता के फैसले को कितना प्रभावित करता है और बंगाल की सत्ता किसके हाथ में जाती है।
