WhatsApp की प्राइवेसी विवाद ने पकड़ी बड़ी तेज़ी: सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख दिखाया

भारत में WhatsApp सिर्फ एक मैसेजिंग ऐप नहीं बल्कि लोगों की ज़िंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। परिवार, ऑफिस, बिज़नेस या पेमेंट की बातचीत में यह ऐप हर जगह मौजूद रहता है। लेकिन जब देश की सर्वोच्च अदालत ने WhatsApp की पैरेंट कंपनी Meta को कड़े शब्दों में चेतावनी दी, तो मामला सुर्ख़ियों में आ गया। कोर्ट ने साफ कहा कि अगर कंपनियां भारत के संविधान का पालन नहीं कर सकतीं, तो उन्हें यहां से जाना चाहिए। यह कड़ी टिप्पणी इस बात का संकेत थी कि निजता और डेटा सुरक्षा के मामले में कोर्ट बिल्कुल भी समझौता करने को तैयार नहीं है।
WhatsApp की नई प्राइवेसी पॉलिसी और यूजर की सहमति
यह विवाद 2021 में WhatsApp द्वारा लागू की गई नई प्राइवेसी पॉलिसी से शुरू हुआ था। इस अपडेट में कहा गया था कि WhatsApp, Meta समूह की अन्य कंपनियों के साथ यूजर डेटा साझा कर सकता है। लेकिन सबसे बड़ी बात यह थी कि यूजर के पास सिर्फ दो विकल्प थे — या तो नई शर्तें स्वीकार करें या फिर ऐप छोड़ दें। इस मजबूरी ने यूजर्स के बीच भारी नाराज़गी फैला दी। जबकि WhatsApp ने दावा किया कि दोस्तों और परिवार की चैट एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड होती है, पर बिजनेस चैट से जुड़ा डेटा कलेक्ट किया जा सकता है, जो लोगों के लिए चिंता का विषय बना।

सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता
2026 में इस मामले ने तब नया मोड़ लिया, जब Meta और WhatsApp ने भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) के 213.14 करोड़ रुपये के जुर्माने को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश की बेंच ने सवाल उठाया कि जब यूजर्स के पास विकल्प ही न हो, तो सहमति को असली कैसे माना जा सकता है। कोर्ट ने इसे “बनावटी सहमति” कहा, जिसमें यूजर्स पर दबाव डालकर उन्हें मजबूरन हां कहना पड़ता है। अदालत ने कहा कि WhatsApp की पकड़ इतनी मजबूत है कि लगभग हर कोई इसे इस्तेमाल करता है, इसलिए लोगों के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता। निजता का अधिकार सर्वोपरि है और व्यापारिक लाभ संविधान से ऊपर नहीं।
Meta को 9 फरवरी तक अल्टीमेटम
सुप्रीम कोर्ट ने Meta और WhatsApp को 9 फरवरी तक हलफनामा देने का आदेश दिया है, जिसमें उन्हें स्पष्ट करना होगा कि यूजर्स का डेटा साझा नहीं किया जाएगा। अगर ऐसा भरोसा नहीं दिया गया, तो कोर्ट अपीलों को खारिज भी कर सकती है। हालांकि WhatsApp का भारत छोड़ना फिलहाल असंभव लगता है क्योंकि भारत इसका सबसे बड़ा बाजार है। कोर्ट का मकसद बाहर निकालना नहीं, बल्कि कंपनियों को संविधान का सम्मान करना सिखाना है ताकि यूजर्स की निजता पूरी तरह सुरक्षित रहे।
