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सुप्रीम कोर्ट ने कहा OBC क्रीमी लेयर सिर्फ सैलरी से नहीं तय होगी, बड़ा फैसला सुनाया

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (11 मार्च, 2026) को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के उम्मीदवार का क्रीमी या नॉन-क्रीमी लेयर (NCL) में होना सिर्फ उनकी आमदनी पर निर्भर नहीं करेगा। कोर्ट ने कहा कि 1993 के मूल दिशानिर्देशों के अनुसार, पद की स्थिति, सरकारी नौकरी का ग्रुप और अन्य फैक्टर्स को भी ध्यान में रखना होगा। यह फैसला उन उम्मीदवारों के लिए बड़ी राहत है, जिन्हें पहले सैलरी के आधार पर क्रीमी लेयर मानकर आरक्षण से वंचित रखा गया था।

सरकारी पद और कृषि आय को नहीं जोड़ा जाएगा

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि माता-पिता सरकारी नौकरी में ग्रुप C या D (क्लास III या IV) में हैं, तो उनकी सैलरी को क्रीमी लेयर तय करने के लिए नहीं जोड़ा जाएगा। साथ ही कृषि से होने वाली आय को भी पूरी तरह से बाहर रखा जाएगा। कोर्ट ने यह तय किया कि परिवार की कुल आय सिर्फ ‘अन्य स्रोतों’ (जैसे बिजनेस, प्रॉपर्टी, किराया आदि) से तीन लगातार वर्षों में औसतन 8 लाख रुपए प्रति वर्ष से कम होनी चाहिए। इस फैसले से अब सरकारी नौकरी में काम करने वाले हजारों ओबीसी उम्मीदवारों को उनके वास्तविक NCL स्टेटस के आधार पर आरक्षण मिलेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा OBC क्रीमी लेयर सिर्फ सैलरी से नहीं तय होगी, बड़ा फैसला सुनाया

पुराने आदेशों को अमान्य घोषित किया

सुप्रीम कोर्ट ने 2004 के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के पत्र के पैरा 9 को अमान्य कर दिया। इस पत्र में बैंक, प्राइवेट सेक्टर या पीएसयू कर्मचारियों की सैलरी को क्रीमी लेयर में शामिल करने की बात कही गई थी। कोर्ट ने इसे भेदभावपूर्ण बताया और कहा कि सरकारी कर्मचारियों के बच्चों और प्राइवेट या पीएसयू कर्मचारियों के बच्चों के साथ अलग व्यवहार नहीं किया जा सकता। अब केवल 1993 के मूल आदेश ही लागू होंगे, जब तक पीएसयू या प्राइवेट पोस्ट की सरकारी ग्रुप थर्ड या फोर्थ के साथ समकक्षता तय नहीं हो जाती।

आरक्षण का असली मकसद अब बहाल होगा

फैसले के बाद डीओपीटी को 6 महीने के भीतर इस निर्णय को लागू करना होगा। जरूरत पड़ने पर सुपरन्यूमरेरी पोस्ट्स (अतिरिक्त पद) बनाए जाएंगे, ताकि अन्य कैटेगरी के कर्मचारियों की सीनियरिटी प्रभावित न हो। भविष्य में सिविल सर्विसेज परीक्षा में वैध OBC-NCL सर्टिफिकेट (जिला मजिस्ट्रेट या तहसीलदार से जारी) को प्राथमिकता दी जाएगी और सिर्फ सैलरी के आधार पर रिजेक्शन बंद हो जाएगा। इस फैसले से OBC आरक्षण का असली मकसद, यानी वास्तविक जरूरतमंद पिछड़े वर्ग तक लाभ पहुंचाना, बहाल होगा।

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