सरकार ने रिफाइनरिंग कंपनियों से कहा निर्यात घटाएं, घरेलू बाजार में तेल उपलब्ध कराएं

पश्चिम एशिया में जारी अनिश्चितता का असर अब भारत पर भी साफ दिखाई दे रहा है। पिछले तीन दिनों से कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उछाल देखा जा रहा है, जिससे तेल आयात करने वाले देशों पर आर्थिक दबाव बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि युद्ध लंबा खिंचता है तो तेल की कीमतों में और तेजी देखने को मिल सकती है। भारत में ईंधन और गैस की जरूरतों के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण साबित हो सकती है।
सरकार और रिफाइनरिंग कंपनियों की रणनीति
भारत सरकार ने इस हालात से निपटने के लिए रिफाइनरिंग कंपनियों के साथ बातचीत शुरू कर दी है। संभावित तेल की कमी को देखते हुए सरकार कंपनियों से निर्यात घटाने और घरेलू बाजार में इसे उपलब्ध कराने का सुझाव दे सकती है। इसके अलावा, घरेलू उत्पादन बढ़ाने की योजना भी बनाई जा रही है, खासकर रसोई गैस के मामले में। सरकार का उद्देश्य यह है कि घरेलू ऊर्जा जरूरतें बाधित न हों और जनता को आपूर्ति में कमी का सामना न करना पड़े।

लंबा युद्ध बढ़ा सकता है ईंधन कीमतों में उछाल
सरकार केवल रिफाइनरिंग कंपनियों पर ही निर्भर नहीं है, बल्कि दूसरे विकल्पों की भी तलाश कर रही है ताकि ईरान और होर्मुज स्ट्रेट पर निर्भरता कम की जा सके। हालांकि, खुदरा ईंधन की कीमतों में तुरंत वृद्धि की संभावना कम है। रिफाइनरिंग कंपनियां बाजार की स्थिति के अनुसार संतुलित नीति अपनाती हैं। वैश्विक स्तर पर कीमतों में आई तेजी से कंपनियों को कुछ समय तक नुकसान उठाना पड़ता है, लेकिन कीमतें कम होने पर वे अपने घाटे की भरपाई कर लेती हैं।
भारत की ऊर्जा जरूरतें और आयात पर निर्भरता
भारत की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात पर टिका हुआ है। देश की कुल कच्चे तेल की मांग का लगभग 90 प्रतिशत आयात के माध्यम से पूरा किया जाता है। वहीं रसोई गैस की 60-65 प्रतिशत और LNG की खपत का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा भी आयात पर निर्भर है। इन आपूर्तियों का अधिकतर भाग पश्चिम एशिया से आता है और होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते से गुजरता है। यदि युद्ध जैसी परिस्थितियां लंबे समय तक जारी रहती हैं तो सप्लाई बाधित हो सकती है और देश में ऊर्जा संकट की संभावना बढ़ सकती है।
