स्मार्टफोन अनलॉक करने का नया तरीका Vital ID तकनीक ने बढ़ाई सुरक्षा की उम्मीद

वैज्ञानिकों ने लॉगिन और डिवाइस सुरक्षा के क्षेत्र में एक नई क्रांतिकारी तकनीक विकसित की है जिसे Vital ID नाम दिया गया है। इस तकनीक के जरिए अब स्मार्टफोन या अन्य डिवाइस को पासवर्ड या बायोमैट्रिक के बजाय व्यक्ति की दिल की धड़कन और सांसों के आधार पर अनलॉक किया जा सकेगा। यह सिस्टम उपयोगकर्ता के शरीर से निकलने वाले वाइटल सिग्नल्स को पहचानकर उसकी पहचान सुनिश्चित करता है। सबसे खास बात यह है कि इसके लिए किसी अतिरिक्त हार्डवेयर की जरूरत नहीं होती और यह मौजूदा सेंसर के माध्यम से ही काम करता है। इससे यूजर्स को एक नया और सुरक्षित अनुभव मिलने की संभावना है।
Vital ID कैसे काम करता है
Vital ID तकनीक पर न्यू जर्सी इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी टेम्पल यूनिवर्सिटी और टेक्सास A&M यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने मिलकर काम किया है। यह तकनीक इंसान की सांस लेने और दिल की धड़कन से उत्पन्न सूक्ष्म वाइब्रेशन को पकड़ती है। ये हलचलें शरीर के भीतर से गुजरते हुए गर्दन और सिर तक पहुंचती हैं और इन्हीं के आधार पर पहचान की जाती है। चूंकि हर व्यक्ति के शरीर की बनावट हड्डियों और टिशू की संरचना अलग होती है इसलिए हर इंसान के वाइटल सिग्नल्स भी यूनिक होते हैं। यही विशेषता इस तकनीक को अधिक सुरक्षित बनाती है और इसे पारंपरिक बायोमैट्रिक सिस्टम से अलग बनाती है।

डिवाइस और सेंसर के साथ संगतता
इस तकनीक का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसे किसी खास हार्डवेयर की जरूरत नहीं होती। Vital ID स्मार्टफोन टैबलेट और XR डिवाइस में मौजूद मोशन सेंसर का उपयोग करता है। आजकल के कई प्रीमियम स्मार्टफोन में पहले से ही ऐसे सेंसर मौजूद होते हैं जो हलचल और वाइब्रेशन को पहचान सकते हैं। इस तकनीक को केवल सॉफ्टवेयर के माध्यम से डिवाइस में इंटीग्रेट किया जा सकता है। इसका मतलब है कि मौजूदा डिवाइस में किसी बड़े बदलाव की आवश्यकता नहीं होगी और उपयोगकर्ता आसानी से इस फीचर का लाभ ले सकेंगे।
टेस्टिंग और भविष्य की संभावनाएं
Vital ID तकनीक की टेस्टिंग 2025 में ACM कॉन्फ्रेंस ऑन कंप्यूटर एंड कम्युनिकेशंस सिक्योरिटी में प्रस्तुत की गई थी। शोधकर्ताओं ने 10 महीनों तक 52 प्रतिभागियों पर XR हेडसेट के जरिए इसका परीक्षण किया। परिणाम बेहद प्रभावशाली रहे जहां सिस्टम ने 95 प्रतिशत से अधिक मामलों में सही यूजर की पहचान की और 98 प्रतिशत से अधिक मामलों में अनधिकृत उपयोगकर्ताओं को रोकने में सफलता पाई। इस तकनीक में एक फिल्टरिंग सिस्टम भी विकसित किया गया है जो सिर की हलचल या अन्य बाधाओं को नजरअंदाज कर केवल दिल की धड़कन और सांस की वाइब्रेशन के आधार पर पहचान करता है। आने वाले समय में यह तकनीक लॉगिन और डिजिटल सुरक्षा के तरीके को पूरी तरह बदल सकती है।
