SIP बंद होने से पहले ये गलतियां कर देती हैं निवेशकों को नुकसान

म्यूचुअल फंड में निवेश का सबसे लोकप्रिय तरीका एसआईपी यानी सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान माना जाता है। इसमें निवेशक हर महीने एक तय राशि निवेश करते हैं। लेकिन कई बार वित्तीय परेशानी या बैंक अकाउंट में बैलेंस कम होने की वजह से एसआईपी की किस्त समय पर नहीं कट पाती। ऐसी स्थिति को एसआईपी मिस या एसआईपी बाउंस कहा जाता है। जब ऐसा होता है तो निवेशक के मन में सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि क्या कोई पेनल्टी लगेगी और क्या इससे रिटर्न पर असर पड़ेगा। दरअसल एक या दो बार एसआईपी मिस होने से निवेश पूरी तरह बंद नहीं होता लेकिन इसका असर आपकी निवेश योजना की गति पर जरूर पड़ सकता है।
एसआईपी बाउंस होने पर कितना चार्ज लगता है और बैंक क्या काटते हैं
जब किसी निवेशक की एसआईपी पेमेंट बैंक अकाउंट में पर्याप्त बैलेंस न होने के कारण फेल हो जाती है तो बैंक की तरफ से बाउंस चार्ज लगाया जाता है। यह चार्ज अलग अलग बैंकों में अलग होता है। आम तौर पर ICICI बैंक और कोटक महिंद्रा बैंक लगभग 500 रुपये तक चार्ज लेते हैं। SBI और पंजाब नेशनल बैंक लगभग 250 रुपये का शुल्क लगाते हैं। वहीं HDFC बैंक में यह चार्ज करीब 450 रुपये तक हो सकता है। यह चार्ज हर असफल ट्रांजैक्शन पर लागू होता है। यानी अगर एक ही महीने में कई एसआईपी बाउंस होती हैं तो हर एक पर अलग अलग चार्ज लग सकता है जिससे कुल लागत बढ़ जाती है और निवेशक पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है।

चार्ज के साथ जीएसटी और कुल खर्च कितना बढ़ जाता है निवेशक को समझें
एसआईपी बाउंस होने पर सिर्फ बैंक चार्ज ही नहीं बल्कि उस पर 18 प्रतिशत जीएसटी भी लगाया जाता है। उदाहरण के तौर पर अगर किसी निवेशक की पांच एसआईपी हैं और हर एसआईपी पर 250 रुपये का बाउंस चार्ज लगता है तो कुल चार्ज 1250 रुपये होगा। इसके ऊपर 18 प्रतिशत जीएसटी यानी लगभग 225 रुपये और जुड़ जाएंगे। इस तरह कुल अतिरिक्त खर्च 1475 रुपये तक पहुंच सकता है। इसके अलावा निवेशक को अपनी नियमित एसआईपी राशि भी बाद में भरनी होती है। इसका मतलब यह हुआ कि एसआईपी मिस होने पर केवल निवेश में देरी नहीं होती बल्कि अतिरिक्त आर्थिक बोझ भी बढ़ जाता है जो लंबे समय में रिटर्न पर असर डाल सकता है।
एसआईपी मिस होने से कैसे बचें और निवेश को कैसे सुरक्षित रखें
एसआईपी मिस होने से बचने के लिए सबसे जरूरी है कि जिस बैंक अकाउंट से ऑटो डेबिट लिंक है उसमें पर्याप्त बैलेंस हमेशा रखा जाए। इसके अलावा निवेशक अपने मोबाइल में रिमाइंडर सेट कर सकते हैं ताकि उन्हें एसआईपी डेट की पहले से जानकारी रहे। एक और बेहतर तरीका यह है कि अगर आपके पास कई एसआईपी चल रही हैं तो उनकी डेट अलग अलग रखी जाए ताकि किसी एक महीने में फाइनेंशियल दबाव न बने। अगर कभी वित्तीय संकट आ जाए तो एसआईपी को बंद करने की बजाय उसे अस्थायी रूप से रोकने या कम राशि में बदलने पर भी विचार किया जा सकता है। सही प्लानिंग के साथ एसआईपी लंबी अवधि में मजबूत वेल्थ क्रिएशन का जरिया बन सकती है।
